भागलपुरः 25 साल बाद भी मुआवज़े का इंतज़ार

भागलपुर दंगा
    • Author, मनीष शांडिल्य
    • पदनाम, बीबीसी हिंदी डॉटकॉम के लिए
  • प्रकाशित

भागलपुर शहर में 24 अक्तूबर 1989 को हुए दंगों में आधिकारिक आँकड़ों के अनुसार 1,100 से ज़्यादा लोग मारे गए थे.

इस दंगे ने धीरे-धीरे शहर के साथ तत्कालीन भागलपुर ज़िले के 18 प्रखंडों के 194 गांवों को अपने चपेट में ले लिया था.

सरकारी दस्तावेजों के मुताबिक ये दंगे दो महीने तक चले. सामाजिक कार्यकर्ता और दंगा पीड़ित कहते हैं कि लगभग छह महीने तक दंगे नहीं रुके थे.

भागलपुर दंगों के 25 सालों बाद पीड़ितों के दावों की जांच-पड़ताल के बाद मुआवज़ा राशि का भुगतान किया गया है.

लेकिन अब भी बड़ी संख्या में पीड़ित अलग-अलग आधार पर मुआवज़े की मांग कर रहे हैं.

मनीष शांडिल्य की रिपोर्ट विस्तार से

भागलपुर के दंगा पीड़ित

भागलपुर से बांका जाने वाली मुख्य सड़क पर शहर से क़रीब पच्चीस किलोमीटर दूर बसा है नया टोला हसनपुर-डुमरामा गाँव.

यह एक नया गांव है जो अब बांका ज़िले का हिस्सा है.

भागलपुर दंगों के बाद विस्थापित हुए 25 गांवों के 600 से अधिक परिवार यहीं आकर बसे थे.

गाँव की शुरुआत एक बड़े खुले मैदान से होती है जिसके पास एक कुआं और बड़ा आम का पेड़ है. आम के पेड़ के नीचे ही मुझे कई दंगा पीड़ित मिले.

बूढ़ी हो चली बीबी नूरजहाँ रामपुर गाँव से यहाँ आकर बसी थीं. नूरजहां के मुताबिक उनके पति मोहम्मद इस्माइल दंगों में मारे गए थे. नूरजहां ने एफ़आईआर भी लिखाई थी.

दंगा पीड़ित नूरजहाँ
इमेज कैप्शन, नूरजहाँ का दावा है कि उनके पति दंगों में मारे गए लेकिन सरकार उन्हें ज़िंदा मानती हैं.

लेकिन इंसाफ़ की सभी चौखटों के चक्कर लगाने के बाद उन्हें अब तक न इंसाफ़ मिला है न मुआवज़ा. क्योंकि सरकारी रिकॉर्ड में उनके पति जीवित हैं.

यहाँ नूरजहां जैसे दर्जनों परिवार हैं जिन्हें दंगों के पच्चीस साल बाद भी मुआवज़ा नहीं मिल सका है.

मुआवज़ा नीति

बिहार सरकार ने मृत या लापता व्यक्तियों के 861 मामले में स्वीकार किए हैं. उनके परिजनों को अब तक प्रधानमंत्री राहत कोष से दस हज़ार, बिहार सरकार से एक लाख और फिर सिख दंगों की तर्ज पर साढ़े तीन लाख रुपये की सहायता राशि मिली है. लेकिन जिनके दावे स्वीकार नहीं किए गए हैं वे हर तरह की सहायता राशि से अब तक वंचित हैं.

दिल्ली स्थित संस्था 'सेंटर फ़ॉर इक्विटी स्टडीज़' ने 50 दंगा प्रभावित गाँवों के दो हज़ार से अधिक परिवारों का अध्ययन किया.

संस्था के मुताबिक उसे 50 से अधिक ऐसे परिवार मिले जिनके लोग दंगों में मारे गए लेकिन जिन्हें किसी तरह का कोई मुआवज़ा नहीं मिल पाया.

स्थानीय सामाजिक कार्यकर्ता प्रवीर इस अध्ययन में शामिल रहे हैं.

भागलपुर दंगा
इमेज कैप्शन, भागलपुर जिलाधिकारी कार्यालय के दंगा सेल में मुआवजे की फ़ाइलें धूल खा रही हैं.

वह बताते हैं कि सरकार की मुआवज़ा नीति के तहत ऐसे परिवार मुआवज़े के हक़दार तो हैं उनके पास अपने दावों को साबित करने के लिए साक्ष्य नहीं है.

जो परिवार दंगे के दौरान या उसके कुछ दिनों बाद एफआईआर दर्ज नहीं करवा सके थे, उनके दावे प्रशासन स्वीकार नहीं करता.

हालांकि ऐसे दावों के सत्यापन के लिए भी मुआवज़ा नीति में व्यवस्था है.

लेकिन प्रवीर के अनुसार सरकारी अधिकारियों के सत्यापन के सहारे पूरी होने वाली यह लंबी प्रक्रिया शायद ही किसी परिवार के लिए मददगार साबित हुई हो.

भागलपुर
इमेज कैप्शन, दंगों के दौरान धर्मस्थलों को भी बड़े पैमाने पर निशाना बनाया गया.

क्षतिपूर्ति-मुआवज़ा

दंगे के पहले दिन ही भागलपुर शहर के परबत्ती इलाके के रहने वाले प्रोफेसर सैयद वासिफ़ अली के पिता और उनकी चाची मारी गई थीं. इसके बाद उनकी हवेली लूट ली गई और उस पर कब्ज़ा कर लिया गया. बाद में उन्हें अपनी ज़मीन बाज़ार भाव के मुक़ाबले काफ़ी कम कीमत में बेचनी पड़ी.

वासिफ़ अली बताते हैं कि उन्हें मृतक मुआवज़ा तो मिला लेकिन क्षतिपूर्ति मुआवज़े के नाम पर तब उन्हें केवल दो किस्तों में चौदह हज़ार रुपये ही मिले थे.

उनका कहना है कि उनका नुक़सान मिले मुआवज़े से बहुत ज़्यादा था. वे फिलहाल उचित क्षतिपूर्ति मुआवज़े के लिए कानूनी लड़ाई लड़ रहे हैं.

सैकड़ों और दंगा पीड़ितों को भी मुआवज़े के नाम पर बेहद कम रक़म दी गई थी. ये परिवार जो आज भी उचित क्षतिपूर्ति मुआवज़े के इंतजार में हैं.

'मात्र बाइस घायल'

इदरीस नदाब दंगा पीड़ित
इमेज कैप्शन, इदरीस जैसे सैकड़ों दंगा पीड़ित और हैं जो घायल तो हुए लेकिन मुआवजा नहीं मिला.

सरकारी आँकड़ों के मुताबिक भागलपुर दंगों में सिर्फ़ बाइस लोग ही घायल हुए थे. पीड़ितों के दावे इसके ठीक उलट हैं.

दंगों में विस्थापित हुए मोहम्मद इदरीस नदाब सलमपुर गाँव से नया टोला हसनपुर-डुमरामा आकर बसे थे. उनके दाहिने पैर में छर्रा लगा था. उचित इलाज न मिल पाने के कारण बाद में उनका पैर ही काटना पड़ा था.

इदरीस कहते हैं कि उन्हें कोई मुआवज़ा नहीं दिया गया.

इदरीस और उन जैसे सैकड़ों लोगों ने मुआवज़े के लिए अदालत का दरवाजा भी खटखटाया है. इस मामले में सुनवाई चल रही है.

दंगा पीड़ित
इमेज कैप्शन, दंगों के पच्चीस साल बाद भी पीड़ितों की ज़िंदग़ी पूरी तरह पटरी पर नहीं लौट पाई है.

आश्वासन

अलग-अलग तरह के ऐसे दावों के संबंध में बिहार सरकार के गृह विभाग के प्रधान सचिव आमिर सुबहानी यह भरोसा दिलाते हैं कि सरकार इन दावों पर खुले दिमाग से विचार कर रही है. जांच के बाद जो दावे सही पाए जाएंगे उनको रकम और राहत दिलवाने के लिए कार्रवाई की जाएगी.

हालांकि उनका यह भी कहना है कि ये दावे बहुत देर से किए गए हैं और इन पर सवाल भी उठ रहे हैं.

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