शिवसेना और भाजपा: कितने पास, कितने दूर?

नरेंद्र मोदी और उद्धव ठाकरे
    • Author, देवीदास देशपांडे
    • पदनाम, बीबीसी हिंदी डॉटकॉम के लिए
  • प्रकाशित

महाराष्ट्र में शिवसेना और भारतीय जनता पार्टी गठबंधन नाज़ुक मोड़ पर खड़ा है जिसके बने रहने पर अब सवाल उठ रहे हैं.

लेकिन इस 25 वर्ष पुराने गठबंधन के लिए यह पहला मौका नहीं है कि उसकी दरारें इस तरह उभर कर सामने आई हो.

हिचकोले खाते गठबंधन पर एक नज़र.

1989 में भाजपा नेता प्रमोद महाजन और शिवसेना के संस्थापक बाल ठाकरे के प्रयासों से ये गठबंधन हुआ था. लेकिन दो वर्ष बाद ही दोनों पार्टियों में एक दूसरे की आलोचना का ऐसा दौर चला कि लगा अब ये कभी साथ नहीं होंगे.

प्रमोद महाजन
इमेज कैप्शन, प्रमोद महाजन और बाल ठाकरे के प्रयासों से सेना-भाजपा गठबंधन स्थापित हुआ

उस समय छगन भुजबल ने शिवसेना छोड़कर कांग्रेस का दामन थाम लिया था और विधानसभा में शिवसेना के सदस्यों की संख्या भाजपा से कम हो गई.

तब भाजपा के नेता गोपीनाथ मुंडे ने विधानसभा में विपक्ष के नेता पद का दावा ठोंक दिया और शिवसेना को ये काफ़ी नाग़वार गुज़रा था.

कुछ ऐसे ही हालात साल 2005 में बने जब नारायण राणे ने शिवसेना छोड़ी. उस समय शिवसेना ने रामदास कदम को विपक्ष के नेता के रूप में मनोनीत किया था. लेकिन भाजपा का कहना था कि उसके सदस्यों की संख्या अधिक होने के कारण यह पद उसे मिलना चाहिए.

लोकसभा चुनाव

साल 2009 के लोकसभा चुनावों के दौरान शिवसेना को राज ठाकरे के नेतृत्व वाले एमएनएस ने घेर रखा था जबकि भाजपा उससे पींगे बढा रही थी. इस कारण शिवसेना-भाजपा में मनमुटाव ज़ोरों पर था. यही हाल इस वर्ष लोकसभा चुनावों में भी देखा गया.

ठीक लोकसभा चुनावों से पहले नितिन गडकरी ने राज ठाकरे के घर जाकर उनसे बात की थी और उन्हें एनडीए में शामिल कराने की कोशिश की थी.

भाजपा के इस क़दम के बाद शिवसेना ने ऐलान किया था कि वह एनडीए से बाहर जाएगी. चुनावों के दौरान भी राज ठाकरे ने नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री पद की उम्मीदवारी को भी समर्थन दिया था. इससे शिवसेना और भाजपा के बीच जो संदेह का माहौल बना वह अभी तक क़ायम है.

चुनावों के बाद शिवेसना को कम से कम छह मंत्री पद मिलने की उम्मीद थी.

बाल ठाकरे

लेकिन मोदी मंत्रिमंडल में सिर्फ़ अनंत गीते को स्थान मिला और वह भी भारी उद्योग मंत्रालय में. इस बात को लेकर शिवसेना इतनी नाराज़ थी कि गीते ने दो दिनों तक अपना पद नहीं संभाला.

''बनावटी गठबंधन''

'लोकसत्ता' अख़बार के संपादक गिरीश कुबेर मानते हैं कि शिवसेना-भाजपा का गठबंधन हमेशा ही बनावटी था.

वे कहते है, “1980 के दौरान जब राम जन्मभूमि आंदोलन उफान पर था, उसका लाभ लेने के लिए शिवसेना ने हिंदुत्व का चोला पहन लिया था. भाजपा बाल ठाकरे के प्रभाव का लाभ लेना चाहती थी इसलिए उनके सारे नखरे वह सहती रही. यह बात प्रमोद महाजन ने खुले तौर पर कही थी. आज जब बाल ठाकरे नहीं रहे तो भाजपा को शिवसेना की ज़रूरत नहीं रही."

वे आगे कहते हैं, "यह तलाक़ कभी ना कभी तो होना ही है. बस महाजन, मुंडे और बाल ठाकरे जैसे नेताओं ने उसे जैसे-तैसे जोड़े रखा था.”

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