मुंबई में ई-कचरा बेचना होगा आसान

    • Author, मधु पाल
    • पदनाम, मुंबई से बीबीसी हिंदी के लिए
  • प्रकाशित

मुंबई भारत की आर्थिक राजधानी तो कही ही जाती है लेकिन इसे देश की वेस्ट कैपिटल के नाम से भी जाना जाता है.

संयुक्त राष्ट्र की एक रिपोर्ट के मुताबिक़ भारत दुनिया भर में पांचवां सबसे बड़ा 'इलेक्ट्रॉनिक वेस्ट' उत्पादक है और साल 2014 में भारत से 17 लाख मीट्रिक टन 'ई कचरा' निकला.

देश में 'ई-कचरा' पैदा करने वाले राज्यों में महाराष्ट्र अव्वल नंबर पर है और एसोचेम (एसोसिएटेड चैम्बर्स ऑफ़ कॉमर्स एंड इंडस्ट्री) के मुताबिक़ मुंबई में करीब एक लाख मीट्रिक टन 'ई-कचरा' हर साल बनता है.

इसे ध्यान में रखते हुए 'क्लीन इंडिया, ग्रीन इंडिया' की सोच के साथ मुंबई बीएमसी ने ई-कचरे को रिसाइकिल करने का फ़ॉर्मूला खोजा है जिसके लिए पीपीपी (पब्लिक प्राइवेट पार्टनरशिप )मॉडल की शुरुआत की गई है.

मुंबई में बने एक ई-कलेक्शन सेंटर को मुंबई नगरपालिका (बीएमसी) और एक निजी संस्था 'ईकोरीको' मिलकर चला रहे हैं और यहां लोग इलेकट्रॉ़निक कचरे जैसे पुराने टीवी, फ्रिज, वॉशिंग मशीन, कंप्यूटर, टेलीफोन आदि को रीसाइकिल करवा सकेंगे.

बीएमसी के एडिशनल कमिश्नर पल्लवी दराडे ने बीबीसी से कहा,"हमारा उद्देश्य अधिक से अधिक लोगों को ई-वेस्ट की सही रिसाइकलिंग के लिए जागरूक करना है.’’

वह कहती हैं, "अभी तक लोग ई-कचरे को बस घर में ही रखते हैं क्योंकि उन्हें इसकी क़ीमत नहीं मिलती पर नई योजना में उपभोक्ता अपना ई-कचरा बीएमसी को बेच सकते हैं."

दराडे के अनुसार अभी तक ई-कचरे की जो भी रिसाइकलिंग की जा रही थी, वह स्क्रैप के कबाड़ी कर रहे थे.

वो कहती हैं,"कबाड़ीवालों के काम में कई खामियां रहती हैं क्योंकि उनके पास 'रिसाइकलिंग' का सही प्रक्षिशण नहीं होता. मुंबई के कई इलाक़ों में सक्रिय कबाड़ीवाले कबाड़ में आई चीज़ें तोड़कर उनसे मुनाफ़े की चीज़ें अलग करते हैं पर ई-कचरे से निकलने वाली विषाक्त चीज़ें जैसे लेड, छोटे तार और कुछ प्लास्टिक का सामान ज़मीन या नालियों में फेंक दिया जाता है. इससे मिट्टी, जल और हवा दूषित होती है और लोग बीमार पड़ते हैं."

मुंबई के साकीनाका इलाक़े के खाड़ी नंबर 3 में कई ऐसे कबाड़खाने हैं, जहां पूरी मुंबई का कबाड़ जमा किया जाता है और वहां काम कर रहे मज़दूर इसे तोड़ने का काम करते हैं.

यहां काम करने वाले रामविलास कहते हैं,"कबाड़ में आए कंप्यूटर और लैपटॉप की स्क्रीन के अच्छे दाम मिल जाते हैं. छोटी कंपनियां हमारे पास आती हैं और इन्हें ले जाती हैं लेकिन वो इनका क्या करती हैं, हमें नहीं पता. हमें इसके लिए महीने के छह-सात हज़ार रुपए मिलते हैं."

वहीं काम करने वाले मोहम्मद का कहना है,"हमें तो किलो के हिसाब से सामान मिलता है, इसमें क्या ज़हरीला, क्या दूषित इसकी जानकारी हमें नहीं दी गई है."

हालांकि 20 वर्षीय आरिफ़ का कहना है, "ई-कचरे में कुछ ख़राब चीज़ों का हमें पता है जैसे -लेड, एसिड, बैटरी क्योंकि उनसे तक़लीफ़ होती है और हम ऐसी चीज़ों को हटा देते हैं लेकिन हर कोई ऐसा नहीं करता."

इकोरीको की ओर से बीके सोनी कहते हैं,"ई-कचरा हमारे लिए एक मुसीबत है और इसे सही तरीक़े से रिसाइकिल कर हम पर्यावरण को दूषित होने से बचा सकेंगे. कबाड़ी इस प्रक्रिया में पर्यावरण के साथ साथ ख़ुद को भी नुक़सान पहुंचाते हैं."

इस नई रीसाइकलिंग मुहिम के ज़रिए महानगर पालिका ई-कचरे से होने वाला नुक़सान रोकना चाहती है साथ ही लोगों को घर में मौजूद ई-कचरे के ख़तरों से भी आगाह करना चाहती है.

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