असम में यूसीसीः बहुविवाह, लिव-इन रिश्तों पर क़ानूनी नियंत्रण या कोई सियासी मक़सद?

असम में समान नागरिक संहिता (यूसीसी) विधेयक विधानसभा में पेश कर दिया गया है

इमेज स्रोत, Anuwar Hazarika/NurPhoto via Getty Images

इमेज कैप्शन, असम में समान नागरिक संहिता (यूसीसी) विधेयक विधानसभा में पेश कर दिया गया है
    • Author, दिलीप कुमार शर्मा
    • पदनाम, गुवाहाटी से बीबीसी हिन्दी के लिए
  • प्रकाशित
  • पढ़ने का समय: 9 मिनट

असम सरकार ने यूसीसी यानी यूनिफ़ॉर्म सिविल कोड (समान नागरिक संहिता) पर विधानसभा में विधेयक पेश किया है.

सोमवार को पेश किए गए इस विधेयक के पक्ष और विपक्ष में बहस शुरू हो गई है.

भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) ने 2026 के विधानसभा चुनावों से पहले अपने घोषणापत्र में असम में यूसीसी लागू करने का वादा किया था.

राज्य में हिमंत बिस्वा सरमा के नेतृत्व में सरकार के गठन के बाद कैबिनेट ने 13 मई को अपनी पहली बैठक में इस बिल को लाने की मंज़ूरी दी थी.

यूसीसी विधेयक की मूल बातें

154 पन्नों के इस बिल में कहा गया है कि इसका उद्देश्य विवाह और तलाक़, उत्तराधिकार, लिव-इन रिश्तों से संबंधित क़ानूनों को नियंत्रित और विनियमित करना है और इससे जुड़े मामलों का संचालन करना है.

असम सरकार ने इस बिल के संदर्भ में एक बयान जारी कर कहा, "अगर यह बिल पास हो जाता है, तो धोखाधड़ी को रोकने के लिए सभी शादियों और तलाक़ का रजिस्ट्रेशन ज़रूरी हो जाएगा. जोड़ों को समारोह के 60 दिनों के भीतर उप-रजिस्ट्रार के समक्ष विवाह ज्ञापन प्रस्तुत करना होगा."

विवाह संबंधी प्रावधानों के तहत, यह विधेयक एक विवाह को अनिवार्य बनाता है और दूल्हों के लिए 21 वर्ष और दुल्हनों के लिए 18 वर्ष की एक समान क़ानूनी आयु निर्धारित करता है.

विधेयक में कहा गया है, "यह प्रस्तावित क़ानून रीति-रिवाजों की पूरी आज़ादी देकर सांस्कृतिक विविधता की रक्षा करता है. इसके तहत शादियाँ किसी भी मौजूदा धार्मिक समारोह या रीति-रिवाज के अनुसार संपन्न की जा सकती हैं. इनमें वैदिक विवाह, अहोम चकलोंग, सप्तपदी, आशीर्वाद, निकाह, पवित्र मिलन और आनंद कारज शामिल हैं."

हालाँकि इस विधेयक में अनुसूचित जनजातियों को छूट दी गई है.

पक्ष-विपक्ष में बहस

उत्तराखंड और गुजरात के बाद यूसीसी लाने वाला तीसरा राज्य बन गया है असम

इमेज स्रोत, Dilip Kumar Sharma

इमेज कैप्शन, उत्तराखंड और गुजरात के बाद यूसीसी लाने वाला तीसरा राज्य बन गया है असम
छोड़कर पॉडकास्ट आगे बढ़ें
दिनभर: पूरा दिन,पूरी ख़बर (Dinbhar)

वो राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय ख़बरें जो दिनभर सुर्खियां बनीं.

एपिसोड

समाप्त

राजनीति और क़ानून के कुछ जानकारों का कहना है कि इस बिल में कई कमियाँ हैं. कुछ लोगों का ये भी दावा है कि यह विधेयक बीजेपी की ध्रुवीकरण की राजनीति का ही हिस्सा है.

जबकि कुछ जानकारों का कहना है कि यह विधेयक अगर क़ानून बना, तो एक बड़े तबके को सामाजिक बुराइयों से बाहर निकालने का काम करेगा.

हालाँकि बीजेपी का कहना है कि महिलाओं के अधिकार और उन पर बढ़ते शोषण को ध्यान में रखते हुए यह विधेयक लाया गया है

बीजेपी के चुनावी घोषणा पत्र में इस बात का ज़िक्र रहा है कि 'जब तक भारत समान नागरिक संहिता नहीं अपना लेता है, तब तक लैंगिक समानता नहीं हो सकती.'

ऐसे में अगर 'यूनिफ़ॉर्म सिविल कोड (यूसीसी), असम, 2026 विधेयक' क़ानून बन जाता है, तो बहुविवाह (एक से ज़्यादा शादी) पर प्रतिबंध लगाना और लिव-इन रिलेशनशिप का रजिस्ट्रेशन ज़रूरी हो जाएगा.

इस बिल पर 27 मई (बुधवार) को विधानसभा में चर्चा होनी है. असम भारत में उत्तराखंड और गुजरात के बाद यूसीसी लाने वाला तीसरा राज्य है.

असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा ने इस विधेयक के बारे में कहा, "इस विधेयक का उद्देश्य विवाह, तलाक़, उत्तराधिकार और लिव-इन संबंधों से जुड़े क़ानूनों को सरल बनाना है. पहली बार बिल में लिव-इन रिश्तों को क़ानूनी रूप दिया जा रहा है. अनिवार्य रजिस्ट्रेशन से पार्टनर्स और ऐसे रिश्तों से पैदा हुए बच्चों के अधिकारों को मान्यता मिलेगी."

विपक्षी पार्टियों ने यूसीसी पर क्या कहा?

अखिल गोगोई का कोट

असम जैसे पूर्वोत्तर राज्य में यूसीसी को लेकर कई तरह के सवाल भी पूछे जा रहे हैं.

असम की कुल आबादी में 34 फ़ीसदी से ज़्यादा मुसलमान हैं और 12 फ़ीसदी से अधिक आबादी आदिवासियों की है. बिल में इस बात का स्पष्ट ज़िक्र है कि यह असम में रहने वाली किसी भी अनुसूचित जनजाति पर लागू नहीं होगा.

ऐसे में कांग्रेस और अन्य विरोधी दल इस बिल को बीजेपी का राजनीतिक एजेंडा बता रहे है. कुछ लोगों का कहना है कि अगर इस बिल में आदिवासी लोगों के लिए छूट है, तो यह एक समान क़ानून कैसे होगा?

ऐसा ही सवाल बीजेपी की पहली सरकार में विधानसभा उपाध्यक्ष रहे और अब कांग्रेस पार्टी से विधायक अमीनुल हक़ लस्कर उठाते हैं.

विधायक लस्कर ने बीबीसी हिन्दी से बातचीत में कहा,"अगर क़ानून का नाम यूसीसी है, तो इससे जनजातियों को क्यों बाहर रखा गया है? यह बिल दरअसल राज्य के 34 प्रतिशत मुसलमानों को निशाना बनाने के लिए लाया गया है. बहुविवाह, शादी की उम्र (बाल विवाह) जैसी समस्याओं के उपाय पिछली बीजेपी सरकार ने पहले ही कर दिए हैं. यह बीजेपी का राजनीतिक एजेंडा है, जहाँ अल्पसंख्यकों को परेशान किया जाएगा. कांग्रेस इस बिल के ख़िलाफ़ है."

प्रदेश की क्षेत्रीय पार्टी 'रायजोर दल' के अध्यक्ष तथा शिवसागर से विधायक अखिल गोगोई इसे बीजेपी आलाकमान को महज़ ख़ुश करने की कोशिश बताते हैं.

इस बिल का विरोध करते हुए विधायक गोगोई कहते हैं,"बहुविवाह पर रोक, शादी का रजिस्ट्रेशन या शादी के लिए न्यूनतम उम्र जैसे प्रावधान पहले से ही मौजूद हैं. इसमें केवल लिव-इन रिलेशनशिप से जुड़े प्रावधानों को जोड़ा गया है. असल मे मुख्यमंत्री सरमा यह बिल केवल अपने 'हाईकमान' और 'संघ परिवार' को ख़ुश करने के लिए लेकर आए हैं."

हिमंत सरकार के समय क़ानूनी तब्दीलियाँ और उनका कनेक्शन

हिमंत बिस्वा सरमा के सीएम बनने के बाद से असम में सांप्रदायिक राजनीति में बेहद आक्रामकता देखने को मिली है- समीर के पुरकायस्थ

इमेज स्रोत, Anuwar Hazarika/NurPhoto via Getty Images

इमेज कैप्शन, 'हिमंत बिस्वा सरमा के सीएम बनने के बाद से असम में सांप्रदायिक राजनीति में बेहद आक्रामकता देखने को मिली है'

भारत में शादी, तलाक़, उत्तराधिकार और गोद लेने के मामलों में विभिन्न समुदायों में उनके धर्म, आस्था और विश्वास के आधार पर अलग-अलग क़ानून हैं.

2021 में हिमंत बिस्वा सरमा के मुख्यमंत्री बनने के बाद जो क़ानून बनाए गए या फिर जिन्हें रद्द किया गया, दरअसल उन्हें प्रदेश के मुसलमानों से जोड़कर देखा गया.

पूर्वोत्तर राज्यों की राजनीति को लंबे समय से कवर कर रहे वरिष्ठ पत्रकार समीर के पुरकायस्थ कहते हैं, "2021 में हिमंत बिस्वा सरमा के सीएम बनने के बाद से असम में सांप्रदायिक राजनीति में बेहद आक्रामकता देखने को मिली है. यह आक्रामकता केवल सीएम के भाषणों में ही नहीं दिखती, बल्कि उनकी सरकार के समय क़ानूनी तब्दीलियों से भी समझी जा सकती है."

समीर पुरकायस्थ के अनुसार सर्वानंद सोनोवाल वाली बीजेपी सरकार के समय में इतनी आक्रामक सांप्रदायिक राजनीति नहीं हुई.

वह कहते हैं,"बात चाहे बाल विवाह निषेध क़ानून के तहत हज़ारों की संख्या में मुसलमानों की गिरफ़्तारी की हो या फिर 2024 में असम मुस्लिम विवाह और तलाक़ रजिस्ट्रेशन अधिनियम को रद्द करने का फ़ैसला या 2025 में असम बहुविवाह निषेध विधेयक को पास करना हो, ये सारे काम सीएम हिमंत के नेतृत्व में किए गए. लिहाजा यूसीसी लाने के पीछे बीजेपी की राजनीति किसी तरह से अलग नहीं है."

समीर के पुरकायस्थ का कोट

सीएम हिमंत के कार्यकाल में क़ानूनों और परिसीमन में बदलाव को पत्रकार समीर एक-दूसरे से जुड़ी कड़ी मानते हैं.

वह कहते हैं,"असल में इन तमाम बदलावों को हिंदुत्व वाली राजनीति का एजेंडा इसलिए बताया जा रहा है, क्योंकि 2021 के पहले निचले असम समेत प्रदेश में कम से कम 11 ऐसे ज़िले थे, जहाँ मुस्लिम आबादी का दबदबा था. लेकिन 2024 के लोकसभा चुनाव से पहले बीजेपी ने परिसीमन के ज़रिए जनसांख्यिकीय पुनर्गठन किया और जिन सीटों में परिसीमन के बाद भी मुस्लिम दबदबा बना रहा, उन सीटों को अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के लिए रिजर्व कर दिया गया."

"इसके नतीजे के तौर पर इस बार के विधानसभा चुनाव में केवल 22 मुसलमान उम्मीदवार ही जीत सके. इससे पहले 30 से अधिक मुस्लिम विधायक सदन पहुँचते थे. यह तमाम चीज़ें एक-दूसरे से जुड़ी हुई हैं."

वहीं राज्य में चार दशकों से पत्रकारिता कर रहे वरिष्ठ पत्रकार नव कुमार ठाकुरिया यूसीसी लाने को बीजेपी के चुनावी वादे से जोड़ते हैं.

वह कहते हैं, "बीजेपी एक रणनीति के तहत इस बिल को लेकर आई है. एक तरफ़ जनजातियों को इससे बाहर रखा है, वहीं दूसरी तरफ मुसलमान लड़कियों के अधिकारों की बात हो रही है."

नव कुमार ठाकुरिया का कोट

नव कुमार ठाकुरिया के मुताबिक़, "मूल रूप से बहुविवाह, बाल विवाह को रोकने के साथ ही मुसलमान लड़कियों को संपत्ति का अधिकार दिलाने की बीजेपी की यह रणनीति आगे उपयोगी साबित होगी. पार्टी इस बिल के ज़रिए ख़ासकर मुसलमान युवतियों का समर्थन हासिल करने का प्रयास करेगी."

"अभी तक मुसलमान के ब्लॉक वोट बीजेपी के ख़िलाफ़ थे. लेकिन बीजेपी ने उसे तोड़ दिया है. हाल के विधानसभा चुनाव में बीजेपी को मुसलमान महिलाओं के वोट मिले हैं. भले ही ये वोट कम मात्रा में थे, लेकिन बीजेपी को आगे फ़ायदा होगा. यूसीसी लागू हो जाने से मुसलमान युवतियों की कम उम्र में शादी नहीं की जा सकेगी. अगर आगे जाकर शादी टूटती है, तो उन्हें संपत्ति का अधिकार मिलेगा."

लेकिन असम में लंबे समय से पत्रकारिता कर रहे अभीक चक्रवर्ती की राय अलग है.

वह कहते हैं, "यूसीसी दरअसल कई मायनों में एक बड़े तबके को सामाजिक बुराइयों से बाहर निकालने का काम करेगा. इस बिल में महिलाओं के अधिकारों को सुरक्षित करने और सामाजिक शोषण को रोकने की बात का ज़िक्र है. अगर इसे व्यावहारिक रूप से लागू किया गया, तो एकतरफ़ा तलाक़ को रोकने और बेटियों के लिए विरासत की रक्षा करने के लिए यह एक मज़बूत क़ानूनी उपाय हो सकता है."

बिना किसी से चर्चा के बिल लाने का आरोप

अब्दुर रज्जाक भुइयां का कोट

सीएम हिमंत पर ये आरोप लग रहा है कि उन्होंने बिना किसी से बातचीत किए इस बिल का ड्राफ़्ट तैयार करवाया और विधानसभा में पेश कर दिया.

जबकि गुजरात और उत्तराखंड जैसे राज्यों ने यूसीसी को लाने से पहले विशेषज्ञों की कमेटी बनाई गई और क़रीब हर तबके के नेतृत्व के साथ चर्चा हुई थी.

असम में इस बिल का ड्रॉफ़्ट तैयार करने को लेकर किसी कमेटी के गठन की कोई आधिकारिक जानकारी सामने नहीं आई है.

गुवाहाटी हाई कोर्ट के वरिष्ठ वकील अब्दुर रज्जाक भुइयां इस बिल को यूसीसी की जगह एसीसी अर्थात "सेलेक्टिव सिविल कोड" बताते हैं.

यूसीसी बिल को लेकर वकील भुइयां बीबीसी हिन्दी से कहते हैं, "कुछ समुदाय को शामिल कर इस बिल को यूसीसी का नाम दिया जा रहा है. किसके साथ विचार-विमर्श कर जनजातियों को बाहर रखा गया? जबकि सुप्रीम कोर्ट के एक फ़ैसले में कहा गया है कि कोई सरकार अगर यूसीसी लाना चाहती है, तो उसे सभी तबके के लोगों के साथ बड़े पैमाने पर सार्वजनिक चर्चा करनी होगी. लिहाजा अगर यह बिल क़ानून बनता है, तो इसे अदालत में कड़ी चुनौती का सामना करना पड़ेगा."

यूसीसी की आलोचना पर बीजेपी का जबाव

विजय कुमार गुप्ता का कोट

इस बिल को लेकर हो रही तमाम तरह की आलोचनाओं का जबाव देते हुए बीजेपी विधायक विजय कुमार गुप्ता कहते हैं,"यह बिल महिलाओं के अधिकार और उन पर बढ़ते शोषण को ध्यान में रख लाया गया है. इस बिल में महिलाओं को संपत्ति और ज़मीन का अधिकार सुनिश्चित किया गया है."

"नारी समाज को बहुविवाह, बाल विवाह से बचाने के इरादे से सरकार काम कर रही है. लिव-इन संबंधों के लिए पंजीयन अनिवार्य किया जाएगा ताकि निजी संबंधों में शोषण, धोखाधड़ी पर रोक लग सके. प्रस्तावित क़ानून के अंतर्गत दूसरी शादी या फिर बहुविवाह के लिए सात वर्ष तक के कारावास का प्रावधान है."

जनजातियों को इससे बाहर रखने के सवाल पर बीजेपी विधायक कहते हैं, "यहां की जनजातियों को पहले से ही विशेष दर्जा दिया हुआ है. लिहाजा उस व्यवस्था को लेकर हम हमेशा संवेदनशील रहते हैं. अगर आगे जाकर जनजातियाँ ख़ुद इस क़ानून को मानने पर विचार करती हैं, तो फिर सोचा जाएगा. जहाँ तक किसी से बिल पर चर्चा नहीं करने की बात है, तो राज्य में सभी तबके के प्रतिनिधि सदन में हैं और बुधवार को इस बिल पर लंबी चर्चा होगी."

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, एक्स, इंस्टाग्राम, यूट्यूब और व्हॉट्सऐप पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)