'पहले लगता था काश मेरा भी बच्चा होता': नसबंदी करवा चुके पूर्व नक्सली कैसे बन रहे हैं मां-बाप

मंदा दोरपेड्डी की अब दो बेटियां हैं और वह ख़ुशहाल ज़िंदगी जी रही हैं

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    • Author, भाग्यश्री राऊत
    • पदनाम, बीबीसी मराठी के लिए
  • प्रकाशित
  • पढ़ने का समय: 7 मिनट

"दूसरों के बच्चे को देखकर लगता था कि अगर मेरा बच्चा होता तो उसे घुमाती, उस पर बहुत प्यार बरसाती, उसको ख़ूब लाड़ करती."

अपने आँगन में पेड़ के नीचे बैठीं मंदा दोरपेड्डी बता रही थीं कि माँ बनने की उनकी इच्छा कितनी तीव्र थी.

मंदा आत्मसमर्पित नक्सलवादी हैं और इस समय गढ़चिरौली की एक बस्ती में रहती हैं. उन्होंने चार कमरों का पक्का घर बनाया है और घर के पास की नर्सरी में मज़दूरी करके अपना गुज़ारा करती हैं.

सरेंडर के बाद उन्हें लगता था कि अब पति-पत्नी के रूप में जीने से आगे बढ़कर बच्चों वाला परिवार होना चाहिए. लेकिन मन में यह भी आता था कि शायद यह संभव नहीं होगा, क्योंकि उनके पति की नसबंदी नक्सल आंदोलन में रहते हुए हो चुकी थी.

लेकिन अब मंदा की माँ बनने की इच्छा पूरी हो गई है. उनकी दो बेटियाँ हैं और उनका हँसता-खेलता परिवार है. यह संभव हुआ गढ़चिरौली पुलिस के प्रोजेक्ट संजीवनी के तहत कृष्णा की नसबंदी को फिर से खोलने (रीओपन) की वजह से.

मंदा कहती हैं, "जब मैं गर्भवती हुई थी तो लगता था कि अब हमारा भी बच्चा आएगा. हमें बच्चा होगा. हम उसे ख़ूब खिलाएंगे. मैं दिल से एकदम ख़ुश हो गई थी."

उनके पति कृष्णा दोरपेड्डी कहते हैं कि बेटियां पैदा होने के बाद से उनकी ज़िंदगी में कई बदलाव आए हैं.

वह कहते हैं, "नसबंदी हटने के बाद पहली बेटी हुई. मैं बाहर से घर आता हूँ तो 'पापा आए, पापा आए' कहते हुए दौड़कर बाहर आती है. देखती है कि मैं क्या खाने को लाया हूँ. यह हमारे लिए बहुत बड़ी ख़ुशी की बात है."

'बेटियों को पढ़ाना हमारा सपना है'

कृष्णा डोरपेड्डी अपनी बेटियों के साथ

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पिता बनने के बाद कृष्णा बेहद ख़ुश हैं. लेकिन यह ख़ुशी पहले उनकी ज़िंदगी में नहीं थी. वह 2003 में नक्सल आंदोलन में शामिल हुए थे. गाँव में नक्सली आते, 'नाच-गाना' करते, उनका पहनावा और हाथ में बंदूक़ देखकर वह आंदोलन में चले गए थे.

2006 में उनका विवाह होना था. उसी समय उनकी नसबंदी की सर्जरी कर दी गई. इसके बाद उन्होंने 2014 तक यानी 11 साल नक्सल आंदोलन में काम किया.

लेकिन पुलिस की गश्त बढ़ गई थी. जंगल में रहना मुश्किल हो गया था इसलिए उन्होंने पत्नी के साथ छिपकर गढ़चिरौली पुलिस के सामने आत्मसमर्पण कर दिया.

कृष्णा बताते हैं कि 2009 से पुलिस बल बढ़ गया था. कहीं पानी नहीं मिलता था. कभी खाना बनाकर खाने को भी नहीं मिलता था. जहाँ भी जाते, पुलिस पहुँच जाती. लगा कि अब यहीं रहकर मरना पड़ेगा. इसलिए एक रात छिपकर निकले और पुलिस के सामने सरेंडर कर दिया.

आत्मसमर्पण करते समय ही उन्होंने पूछताछ में पिता बनने की इच्छा ज़ाहिर की थी.

कृष्णा कहते हैं, "जंगल में तो बच्चों को रख ही नहीं सकते थे. लेकिन यहाँ आने के बाद मन में आया कि क्या नसबंदी खोल सकते हैं? पूछताछ के दौरान बताया कि मेरी नसबंदी हो चुकी है. अगर खोलनी हो तो क्या संभव है? मैं तैयार हूँ."

इसके बाद एक ही साल में उनकी नसबंदी की सर्जरी करके उसे फिर से खोला गया और वह सफल भी रही. 2016 में कृष्णा और मंदा की पहली बेटी हुई. अब उनकी दूसरी बेटी भी तीन साल की है.

अब तक 50 आत्मसमर्पित नक्सलवादियों की नसबंदी हटाई गई है.

कृष्णा और मंदा पढ़-लिख नहीं पाए. लेकिन अब उनकी बड़ी बेटी घर के पास के स्कूल में चौथी कक्षा में पढ़ रही है. उन्होंने सपना देखा है कि अपने बच्चों को पढ़ाकर बड़ा बनाना है.

कृष्णा कहते हैं, "हम कुछ भी नहीं सीख पाए. लेकिन हमारी बेटियों को पढ़ाना हमारा सपना है. जितना पढ़ना चाहें, पढ़ें. हम मज़दूरी करके पैसे देंगे, लेकिन उन्हें पढ़ने देंगे. उनके मन में जो सपना है, उसे पूरा करने देंगे."

आत्मसमर्पण करने वाले 50 नक्सलियों की नसबंदी खोली गई

कृष्णा दोरपेड्डी की तरह ही 50 अन्य आत्मसमर्पित नक्सलवादियों की नसबंदी फिर से खोलने की सर्जरी हुई है, जिनमें से 14 को बच्चे भी हुए हैं

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इमेज कैप्शन, गढ़चिरौली पुलिस के सामने आत्मसमर्पण करते समय नक्सलियों से पूछा जाता है कि मुख्यधारा में आने के लिए उन्हें किन चीज़ों की ज़रूरत है

सिर्फ़ कृष्णा ही नहीं, बल्कि उनके जैसे 50 आत्मसमर्पित नक्सलवादियों की अब तक नसबंदी फिर से खोलने की सर्जरी हुई है. इनमें से 14 को संतान भी हुई है.

इन्हीं में से एक जानू हेडो बताते हैं, "बच्चे हों तो ज़िंदगी अच्छी लगती है. जब हम बूढ़े होते हैं तो बच्चे सहारा बनते हैं. जंगल में बच्चों को रखने की जगह नहीं थी, इसलिए वहाँ हम उन्हें जन्म नहीं दे सकते थे. लेकिन यहाँ हम खुलकर जी सकते हैं."

जानू की भी एक बेटी और एक बेटा है. वो गढ़चिरौली शहर की नवजीवन सोसाइटी में रहते हैं.

गढ़चिरौली पुलिस के सामने आत्मसमर्पण करते समय उनसे पूछा जाता है कि मुख्यधारा में आने के लिए उन्हें किन चीज़ों की ज़रूरत है. इनमें से एक सवाल यह भी होता है कि क्या वो माँ-बाप बनना चाहते हैं.

गढ़चिरौली के तत्कालीन पुलिस अधीक्षक निलोत्पल ने कहा, "जब आत्मसमर्पण की चर्चा होती है तो हम बताते हैं कि मुख्यधारा में आने के लिए जो भी ज़रूरतें होंगी, गढ़चिरौली पुलिस उन्हें उपलब्ध कराएगी. कई लोगों ने आत्मसमर्पण किया था. उनका कहना था कि हम पति-पत्नी हैं, लेकिन पारिवारिक जीवन नहीं जी पा रहे."

उन्होंने आगे कहा, "हम चाहते हैं कि हमें बच्चे हों. यह सुविधा उपलब्ध कराई जाए. हमें यह अवसर दिखा. नसबंदी ऐसी सर्जरी है जिसे फिर से खोला जा सकता है. इसलिए हमने प्लास्टिक सर्जन के माध्यम से यह सुविधा आत्मसमर्पित नक्सलवादियों को उपलब्ध कराई."

निलोत्पल के कार्यकाल में बड़ी संख्या में नक्सलवादियों ने आत्मसमर्पण किया.

'शादी से पहले नसबंदी करने का नियम'

गढ़चिरोली के तत्कालीन पुलिस अधीक्षक निलोत्पल के कार्यकाल में बड़ी संख्या में नक्सलवादियों ने आत्मसमर्पण किया था

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पिछले जनवरी महीने में भी भूपति समेत कुछ नक्सलवादियों ने आत्मसमर्पण किया. वो इस समय पुलिस परिसर के 'सरेंडर सेल' में ही रहते हैं.

इनमें से 14 लोगों की नसबंदी सर्जरी फिर से खोलकर (रीओपन) की गई है. अब उन्हें भी उम्मीद है कि संतान होगी.

शिवकुमार तल्लम, जिनकी सर्जरी हुई थी, वो बताते हैं, "हम जंगल में बच्चों को रख नहीं सकते थे. क्योंकि अगर बच्चे होते और समय पर पुलिस आ जाती तो क्या करते? यही सवाल था. इसलिए शादी से पहले नसबंदी करनी पड़ती थी. पार्टी का यही नियम था. लेकिन अब नसबंदी रीओपन होने से उम्मीद है कि बच्चे होंगे."

सिर्फ 30 साल के राम ताराम कहते हैं, "अब हम जवान हैं, तो काम कर सकते हैं. लेकिन बुढ़ापे में हमारा क्या होगा? बुढ़ापे में सहारे के लिए बच्चे चाहिए. इसलिए नसबंदी रीओपन कराई है. अब हम घर जाएंगे, खेती करेंगे और बच्चे भी होंगे."

'दल के ही लोग करते थे सर्जरी'

आत्मसमर्पण करने वाले पूर्व नक्सली

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इन सबकी सर्जरी जंगल में ही हुई थी. वहीं एक डॉक्टर ने उनकी नसबंदी की थी. ये डॉक्टर दरअसल एमबीबीएस डॉक्टर से ट्रेनिंग पाए हुए दल के ही लोग थे.

जंगल में सर्जरी करने वाले अर्जुन इचामी भी हमें मिले. अर्जुन छठी कक्षा तक पढ़े हैं, लेकिन वह बताते हैं कि जंगल में सारी सर्जरी वही करते थे.

वह कहते हैं, "मुझे एक एमबीबीएस डॉक्टर ने छह महीने ट्रेनिंग दी. मैंने पूरी साइंस सीखी कि बीमारियां कैसे होती हैं और उनका इलाज कैसे करना है. एमबीबीएस डॉक्टर ने मुझे सब सिखाया."

"इसके बाद मैंने सिर्फ़ नसबंदी ही नहीं, बल्कि अन्य सर्जरी भी कीं. कुछ लोग इलाज के लिए रायपुर जाते थे. लेकिन वहाँ फ़ायदा नहीं होता तो मैं जंगल में उनका इलाज करता था. अब तक मैंने 500 लोगों की नसबंदी सर्जरी की है."

अर्जुन ने भी एक साल पहले आत्मसमर्पण किया. अब वह कसनसूर के पास के गाँव में अपने परिवार के साथ रहते और खेती करते हैं.

हालांकि, जांच में शामिल सर्जन डॉक्टर अमित पाटीदार का कहना है कि ऐसे लोगों द्वारा की गई सर्जरी में कुछ ख़ामियां पाई गईं.

वह कहते हैं, "जंगल में हुई कुछ सर्जरी नॉन-स्टैंडर्ड थीं. कहीं एक तरफ़ की गई थी, तो दूसरी तरफ़ नहीं. क्योंकि ये सर्जरी जंगल में अप्रशिक्षित लोगों ने की थीं."

इसके साथ ही वह जोड़ते हैं, "सर्जरी मानक तरीक़े से नहीं हुई थीं, लेकिन यह भी उतना ही सच है कि उन्हें बच्चे नहीं हुए."

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.

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