मुकेश अंबानी पर एलन मस्क के हमले में राहुल गांधी की एंट्री क्या कांग्रेस की लाइन से अलग है?

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एलन मस्क दुनिया के सबसे अधिक आबादी वाले देश भारत के विशाल बाज़ार में अपनी मज़बूत दस्तक चाहते हैं लेकिन अभी तक सफलता नहीं मिली है.
दुनिया के सबसे अमीर व्यक्ति एलन मस्क की प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से आख़िरी मुलाक़ात 2025 की शुरुआत में हुई थी, जब भारतीय प्रधानमंत्री वॉशिंगटन गए थे.
लेकिन उस मुलाक़ात में हुई बातचीत से भारत में मस्क की चुनौतियां कम नहीं हुई थीं.
अमेरिका से भारत के ख़राब होते संबंधों का असर दोनों देशों के बड़े उद्योगपतियों पर भी सीधा पड़ रहा है.
अमेरिका के खरबपति कारोबारी एलन मस्क की कंपनी स्पेसएक्स का सैटेलाइट ब्रॉडबैंड नेटवर्क स्टारलिंक भारत में रेग्युलेटरी मंज़ूरी का इंतज़ार कर रहा है.
एलन मस्क इस इंतज़ार से इतने ख़फ़ा हैं कि उन्होंने गुरुवार को भारत के अरबपति कारोबारी मुकेश अंबानी पर सीधा हमला किया.
मस्क ने सोशल मीडिया पर पोस्ट करते हुए कहा कि स्टारलिंक पिछले पाँच वर्षों से भारतीय क़ानूनों का पालन कर रही है, लेकिन इसके बावजूद उसे अब तक लाइसेंस क्यों नहीं मिला है. उन्होंने सवाल उठाया कि क्या अंबानी का सरकार पर प्रभाव है.
भारत सरकार ने मस्क के आरोपों को ख़ारिज कर दिया है. सरकार ने कहा कि सैटेलाइट संचार के लिए उसका रेग्युलेटरी स्ट्रक्चर "निष्पक्ष और भेदभाव मुक्त" है और लाइसेंस प्राप्त सभी कंपनियां मंज़ूरी प्रक्रिया के लगभग एक ही चरण में हैं.
मस्क ने गुरुवार को अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर पोस्ट किया, "क्या अंबानी भारत के असली बॉस हैं?"
मस्क की इस टिप्पणी को लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने हाथोंहाथ लिया. राहुल गांधी पहले से नरेंद्र मोदी सरकार पर भारत के जाने-माने कारोबारी मुकेश अंबानी और गौतम अडानी के साथ सांठगांठ के आरोप लगाते रहे हैं.

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राहुल के रुख़ पर सवाल
मस्क की अंबानी वाली टिप्पणी को रीपोस्ट करते हुए राहुल गांधी ने एक्स पर लिखा, "भारत में आपका स्वागत है, एलन. ज़रा इंतज़ार कीजिए, जब आपको यहाँ के दूसरे शख़्स के बारे में पता चलेगा."
इसके बाद मस्क ने जवाब दिया, "धन्यवाद, राहुल. यह वाक़ई चिंता की बात है."
राहुल गांधी की इस टिप्पणी को एलन मस्क के समर्थन में देखा गया. हालांकि स्टारलिंक को लेकर कांग्रेस का रुख़ अतीत में मस्क के पक्ष में नहीं रहा है.
कांग्रेस के कम्युनिकेशन जनरल सेक्रेटरी इन-चार्ज जयराम रमेश ने पिछले साल 13 मार्च को कहा था, ''महज 12 घंटे के भीतर एयरटेल और जियो, दोनों ने स्टारलिंक के साथ साझेदारी की घोषणा कर दी. ऐसा लगता है कि भारत में स्टारलिंक की एंट्री को लेकर उनकी सभी आपत्तियां दूर हो गई हैं, जबकि वे काफ़ी समय से इसका विरोध करते आ रहे थे.''
''यह बिल्कुल स्पष्ट है कि इन साझेदारियों की रणनीति ख़ुद प्रधानमंत्री ने तैयार की है. इसका मक़सद स्टारलिंक के मालिक एलन मस्क के ज़रिए राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के साथ अच्छे संबंध बनाना है. सबसे अहम सवाल राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ा है. राष्ट्रीय सुरक्षा की ज़रूरत पड़ने पर कनेक्टिविटी को चालू या बंद करने का अधिकार किसके पास होगा? स्टारलिंक के पास या उसके भारतीय साझेदारों के पास? क्या सैटेलाइट आधारित कनेक्टिविटी सेवाएं देने वाली दूसरी कंपनियों को भी इसकी अनुमति दी जाएगी और अगर हां, तो किस आधार पर?''
मुकेश अंबानी पर एलन मस्क के निशाने के मामले में राहुल गांधी की टिप्पणी जयराम रमेश की समझ से मेल नहीं खाती है. ऐसे में कांग्रेस से सवाल पूछा जा रहा है.
द हिन्दू ग्रुप की डायरेक्टर मालिनी पार्थसारथी मानती हैं कि लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी उन लोगों की उपहासपूर्ण टिप्पणियों को वैधता दे रहे हैं, जो भारत के प्रति शत्रुतापूर्ण रवैया रखते हैं.

मालिनी पार्थसारथी ने राहुल की टिप्पणी को एक्स पर रीपोस्ट करते हुए लिखा है, ''एलन मस्क की टिप्पणियां स्टारलिंक के प्रति भारत सरकार के अब तक के ठंडे रुख़ पर सवाल उठाकर भारत की टेलिकॉम पॉलिसी की संप्रभुता को कमज़ोर करने की कोशिश करती हैं.
यह ऐसे समय में हो रहा है, जब अमेरिका सचमुच भारत के आईटी सेक्टर की दिग्गज कंपनियों को अपनी ज़मीन पर फलने-फूलने से रोक रहा है. यह भारत की अर्थव्यवस्था के प्रति खुली शत्रुता और भारत के दिग्गज उद्योगपतियों की अनदेखी करने का स्पष्ट संकेत है.
सिर्फ़ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से नफ़रत के कारण, लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी उन लोगों की उपहासपूर्ण टिप्पणियों को वैधता दे रहे हैं, जो भारत के प्रति शत्रुतापूर्ण रवैया रखते हैं. ऐसा करके वह वास्तव में भारत को कमज़ोर कर रहे हैं. राहुल गांधी को इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि उनके निजी पूर्वाग्रह उनके राजनीतिक विवेक पर हावी न हों.
भारतीय जनता ऐसे बाहरी ताक़तों के ख़िलाफ़ एकजुट राजनीतिक प्रतिक्रिया की हक़दार है, जो भारत की उभरती अर्थव्यवस्था को कमज़ोर करने की कोशिश कर रही हैं.''
मालिनी की इस पोस्ट के जवाब में लेखक और विश्लेषक सलिल त्रिपाठी ने लिखा है, ''रसूखदार कारोबारी घरानों की एकाधिकारवादी गतिविधियां भारत के लिए गर्व की बात नहीं हैं. यह उन परिवारों और उन लोगों के लिए गर्व की बात है, जिन्हें इनसे फ़ायदा पहुँचता है. भारत तरक्की नहीं कर रहा है, मैं इस बात से सहमत हूँ कि कुछ गिने-चुने उद्योगपतियों का दबदबा ज़रूर बढ़ रहा है.''
कनाडा में फ़्री प्रेस की स्टाफ़ राइटर रूपा सुब्रमण्या ने राहुल और मस्क की टिप्पणियों पर लिखा है, ''यह अजीब होगा अगर एलन मस्क भारत की वामपंथी रुझान वाली कांग्रेस पार्टी का समर्थन करें, जबकि उन्हें दुनियाभर में दक्षिणपंथी पार्टियों का समर्थन करने के लिए जाना जाता है और भारत में भी दक्षिणपंथी पार्टी सत्ता में है. हालांकि, दुनिया में इससे भी ज़्यादा अजीब चीज़ें हुई हैं.''

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भारत में स्टालिंक की अड़चनें
स्पेसएक्स प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार से भारत में स्टारलिंक सेवा शुरू करने की मंज़ूरी का इंतज़ार कर रही है. भारत के टेलिकम्युनिकेशन सेक्टर में अंबानी की रिलायंस इंडस्ट्रीज लिमिटेड और सुनील भारती मित्तल की भारती एयरटेल लिमिटेड के नियंत्रण वाली कंपनियों ने वर्षों से अपनी मज़बूत स्थिति बनाई है.
इससे पहले मस्क ने बिना नाम लिए अपने प्रतिद्वंद्वियों पर स्टारलिंक की भारत में एंट्री रोकने का आरोप लगाया था. इसे मित्तल पर निशाने के तौर पर भी देखा गया.
मस्क ने अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर लिखा, "दुर्भाग्य से, कुछ उद्योगपतियों के एकाधिकार को बनाए रखने और भारतीय लोगों पर अपनी मज़बूत पकड़ बरकरार रखने के लिए हमें रोका जा रहा है. आप अंदाज़ा लगा सकते हैं कि वे कौन हैं."
सरकार के ताज़ा आंकड़ों के मुताबिक़, भारत की दो सबसे बड़ी प्राइवेट टेलिकॉम कंपनियां रिलायंस जियो इन्फोकॉम लिमिटेड और भारती एयरटेल के पास संयुक्त रूप से क़रीब 91 करोड़ ब्रॉडबैंड ग्राहक हैं. यह देश के कुल बाज़ार का 80 प्रतिशत से ज़्यादा है.
मस्क की यह तीखी आलोचना पिछले साल के रुख़ से बिल्कुल अलग है. उस समय स्पेसएक्स ने भारत में स्टारलिंक की सेवाएं उपलब्ध कराने के लिए भारती एयरटेल और रिलायंस की जियो प्लेटफॉर्म्स लिमिटेड के साथ समझौते किए थे.
अमेरिकी मीडिया आउटलेट ब्लूमबर्ग ने इसी साल जून महीने में ख़बर दी थी कि सुरक्षा संबंधी चिंताओं के कारण भारत ने स्टारलिंक की व्यावसायिक सेवाएं शुरू करने के लिए अंतिम मंज़ूरी की प्रक्रिया प्रभावी रूप से रोक दी थी.

ब्लूमबर्ग की रिपोर्ट के अनुसार, मामले की जानकारी रखने वाले लोगों ने उस समय बताया था कि देश के गृह मंत्रालय के अधीन सुरक्षा एजेंसियों ने लो अर्थ ऑर्बिट यानी पृथ्वी की निचली कक्षा में संचालित होने वाली इस सैटेलाइट सेवा को शुरू करने के लिए ज़रूरी मंज़ूरी नहीं दी थी.
स्टारलिंक को भारत में सैटेलाइट संचार का लाइसेंस मिल चुका है, लेकिन व्यावसायिक सेवाएं शुरू करने से पहले उसे सुरक्षा संबंधी मंज़ूरी और स्पेक्ट्रम आवंटन का इंतज़ार है.
ब्लूमबर्ग ने अपनी रिपोर्ट में लिखा है, ''भारती एयरटेल, यूटेलसैट कम्युनिकेशंस के सबसे बड़े शेयरधारकों में से एक है. यूटेलसैट कम्युनिकेशंस, यूटेलसैट वनवेब सैटेलाइट नेटवर्क का संचालन करती है, जो दुनियाभर में स्टारलिंक की सबसे बड़ी प्रतिस्पर्धी कंपनियों में से एक है और लो अर्थ ऑर्बिट में सैटेलाइट संचालित करती है.''
''भारती एयरटेल ने अलग से स्पेसएक्स के साथ भी साझेदारी की है, ताकि अपने भारतीय ग्राहकों को स्टारलिंक की सेवाएं उपलब्ध करा सके. यह इस बाज़ार में उभरते जटिल कारोबारी गठबंधनों का उदाहरण है. रिलायंस की भी सैटेलाइट सेक्टर में अपनी महत्वाकांक्षाएं हैं. इसके लिए वह जियो सैटेलाइट कम्युनिकेशंस और लक्जमबर्ग की सैटेलाइट ऑपरेटर कंपनी एसईएस एसए के साथ काम कर रही है.
''जियो, वनवेब और स्टारलिंक उन तीन कंपनियों में शामिल हैं, जिन्हें भारत में सैटेलाइट संचार सेवाओं के लिए लाइसेंस मिला है. हालांकि, इनमें से किसी ने भी अभी तक पूरी तरह से व्यावसायिक सेवाएं शुरू नहीं की हैं.''

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मस्क मोदी से क्या चाहते हैं?
टेस्ला मस्क की विशाल संपत्ति का सबसे बड़ा हिस्सा है. ब्रिटिश अख़बार फ़ाइनैंशियल टाइम्स की रिपोर्ट के मुताबिक़ इस साल फ़रवरी में टेस्ला ने भारत में सिर्फ़ 29 कारें बेचीं.
भारत इलेक्ट्रिक वाहनों (ईवी) का बहुत बड़ा बाज़ार नहीं है, लेकिन सीमित बिक्री के बावजूद टेस्ला की बाज़ार हिस्सेदारी बेहद कम रही. उस महीने भारतीयों ने कुल 13,733 ईवी ख़रीदीं, जिनमें टेस्ला की हिस्सेदारी महज 0.2 फ़ीसदी थी.
फ़रवरी का महीना कंपनी के लिए ख़राब रहा, लेकिन यह कोई अपवाद नहीं था. टेस्ला ने जुलाई 2025 में भारत में अपने तीन शोरूम में से पहला शोरूम खोला था.
इसके बावजूद कंपनी साल के अंत तक सिर्फ़ 225 कारें ही बेच पाई. यह 2025 में भारत में बिके कुल इलेक्ट्रिक वाहनों का महज 0.13 फीसदी था.
इसकी एक वजह क़ीमत है. टेस्ला की मॉडल वाई की शुरुआती क़ीमत करीब 65,000 डॉलर है, जबकि टाटा मोटर्स की एंट्री-लेवल इलेक्ट्रिक कार की कीमत लगभग 8,500 डॉलर है.
इसकी एक बड़ी वजह आयात शुल्क भी है. 40,000 डॉलर से अधिक क़ीमत वाली कारों पर 110 फ़ीसदी तक आयात शुल्क लगता है. इसके मुक़ाबले, आयातित पुर्जों का इस्तेमाल करके भारत में असेंबल की जाने वाली कारों पर आयात शुल्क 15 फ़ीसदी से शुरू होता है.
यह एक ऐसा सेक्टर है, जहाँ मस्क ने बदलाव की मांग की है. फ़ाइनैंशियल टाइम्स ने लिखा है, ''2024 की गर्मियों में होने वाले भारत के आम चुनावों से पहले मस्क की प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ एक मंच साझा करने की योजना थी. उस समय वह भारत में एक फैक्ट्री लगाने पर विचार कर रहे थे और सरकार कुछ नीतिगत रियायतों के साथ उनका भव्य स्वागत करने को तैयार थी. लेकिन मस्क ने आख़िरी समय में अपना भारत दौरा रद्द कर दिया और इसके बजाय चीन चले गए. इसे आख़िरी वक़्त पर किया गया ऐसा क़दम माना गया, जिससे मोदी नाराज़ ज़रूर हुए होंगे. इसके बाद से नई दिल्ली ने टेस्ला के लिए नीतिगत रियायतें देने से इनकार किया है.''

नई दिल्ली स्थित सेंटर फॉर सोशल एंड इकोनॉमिक प्रोग्रेस के दीपक माहेश्वरी ने फ़ाइनैंशियल टाइम्स से कहा कि जब भी कोई बहुराष्ट्रीय कंपनी भारत में प्रवेश करती है, तो आमतौर पर उसके शीर्ष अधिकारी देश का दौरा करते हैं और यहाँ के प्रमुख नीति-निर्माताओं से मुलाक़ात करते हैं. इसे भारत में कारोबार करने की उनकी प्रतिबद्धता के संकेत के तौर पर देखा जाता है.
मस्क ने अब तक ऐसा दौरा नहीं किया है. वह भारत में कारोबार शुरू करने वाली किसी भी विदेशी कंपनी के सामने आने वाली दो प्रमुख चुनौतियों का समाधान भी नहीं खोज पाए हैं. पहली, एक रूढ़िवादी और संरक्षणवादी नियामकीय व्यवस्था के बीच रास्ता निकालना और दूसरी, पहले से स्थापित मज़बूत कारोबारी प्रतिद्वंद्वियों का मुक़ाबला करना.
मस्क का सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स ही उनका एकमात्र कारोबार है, जिसकी भारत में उल्लेखनीय मौजूदगी है. वर्ल्ड पॉपुलेशन रिव्यू के मुताबिक़, भारत में एक्स के 2.3 करोड़ यूज़र्स हैं. इनमें से ज़्यादातर यूज़र्स तब जुड़े थे, जब 2022 में मस्क ने इसे ख़रीदा था. उस समय यह ट्विटर के नाम से जाना जाता था.
कई देशों में इस प्लेटफॉर्म को मुनाफे़ में लाने के लिए मस्क को संघर्ष करना पड़ा है. लेकिन भारत में उन्हें मोदी सरकार के साथ एक ऐसी अदालती लड़ाई का भी सामना करना पड़ रहा है, जिसे प्लेटफॉर्म के अस्तित्व के लिए बेहद अहम माना जा रहा है. यह लड़ाई सरकार की ओर से सूचना पर कड़े नियंत्रण की कोशिशों को लेकर है.
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