अमेरिकी हमले में तीन भारतीय नाविकों के मारे जाने पर मोदी सरकार की प्रतिक्रिया को लेकर विशेषज्ञ उठा रहे हैं तीखे सवाल

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पश्चिम एशिया में ईरान के ख़िलाफ़ अमेरिकी नाकेबंदी अभियान के दौरान तीन भारतीय नाविकों की मौत हो गई है.
यह अमेरिकी अभियान का पहला ऐसा मामला माना जा रहा है, जिसमें किसी हमले में मौतों की पुष्टि हुई है.
अमेरिका ईरान को तेल निर्यात से होने वाली आय बंद करने और युद्ध समाप्त करने के लिए समझौते पर मजबूर करने के मक़सद से यह अभियान चला रहा है.
इस सप्ताह अमेरिकी सेना ने ओमान की खाड़ी में भारतीय चालक दल वाले तीन तेल टैंकरों पर हमला किया है. इससे वॉशिंगटन और नई दिल्ली के बीच कूटनीतिक तनाव और बढ़ सकता है.
भारत ने इस मुद्दे पर विरोध दर्ज कराते हुए एक वरिष्ठ अमेरिकी राजनयिक को तलब भी किया है.
भारत ने भले इस मामले में अमेरिकी दूतावास के अधिकारी को समन किया है लेकिन सरकार की प्रतिक्रिया को कई लोग नाकाफ़ी मान रहे हैं.
वरिष्ठ पत्रकार कलोल भट्टाचार्जी ने एक्स पर लिखा है, ''शायद इतिहास में पहली बार ऐसा हुआ है कि हेलफायर मिसाइलों का इस्तेमाल भारतीय नागरिकों के ख़िलाफ़ हुआ हो. क्वॉड में हमारा साझेदार देश वाक़ई कमाल का है.''
भारत क्वॉड गुट का हिस्सा है, जो मुक्त समुद्री आवाजाही की वकालत करता है लेकिन अमेरिका इसी आवाजाही में बाधा बन रहा है. क्वॉड गुट में अमेरिका, भारत, जापान और ऑस्ट्रेलिया हैं.
भारतीय विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने गुरुवार को कहा था कि जहाज़ों पर हमला अमेरिका ने किया लेकिन निशाना बनाए गए तीन जहाज़ों में से दो को अमेरिका ने प्रतिबंधित कर रखा था. जायसवाल ने ये भी कहा कि उनमें से एक को "निर्देशों का पालन न करने वाला जहाज़" माना गया था.

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भारत के रुख़ पर सवाल
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जायसवाल की इस टिप्पणी की आलोचना हो रही है. भारत के पूर्व विदेश सचिव और रूस में भारत के राजदूत रहे कंवल सिब्बल ने लिखा है, ''हम प्रतिबंध या नॉन-कंप्लायंस जैसे शब्दों का इस्तेमाल करके अमेरिकी कार्रवाई को अप्रत्यक्ष रूप से सही क्यों ठहरा रहे हैं? ये कार्रवाई अवैध हैं, भले ही जहाज़ भारतीय ध्वज वाले न हों. हमारी चिंता यह है कि भारतीय नाविक मारे गए हैं और सेंटकॉम ने अब तक कोई खेद तक व्यक्त नहीं किया है.''
सिब्बल ने लिखा है, ''अगर भारत और अमेरिका हिंद महासागर में समुद्री सुरक्षा पर सहयोग करते हैं, व्यापक नौसैनिक अभ्यास करते हैं और इंडो-पैसिफिक की अवधारणा का समर्थन करते हैं, तो परिस्थितियां चाहे जो भी हों, हिंद महासागर में भारतीय नाविकों की मौत के प्रति अमेरिका उदासीन नहीं रह सकता.''
अंग्रेज़ी अख़बार द हिन्दू के अंतरराष्ट्रीय संपादक स्टैनली जॉनी ने भी भारत की प्रतिक्रिया पर सवाल उठाया है. उन्होंने एक्स पर लिखा है, ''मैं ये समझ सकता हूँ कि क़तर पर इसराइली बमबारी की निंदा करते समय भारत हमलावर का नाम नहीं लेता. मैं यह भी समझ सकता हूँ, जब भारत यूक्रेन में रूसी हमलों की निंदा करते समय किसी का नाम नहीं लेता.''

''इसी तरह, अगर भारत फारस की खाड़ी की राजशाही सरकारों पर ईरानी हमलों की निंदा करते समय भी नाम लेने से बचता है, तो उसे मैं रणनीतिक संतुलन कह सकता हूँ. लेकिन मैं यह नहीं समझ पाता कि भारत उस देश का नाम क्यों नहीं लेता, जिसने भारतीय नागरिकों को ले जा रहे जहाज़ों पर मिसाइलें दागीं और उनमें से तीन भारतीयों की जान ले ली, वह भी भारत के पड़ोस के समुद्री क्षेत्र में.''
भारत ने बुधवार को जो बयान जारी किया था, उसमें अमेरिका नाम तक नहीं लिया था.
भारत के रुख़ पर सामरिक मामलों के जाने माने विश्लेषक ब्रह्मा चेलानी ने भी सवाल उठाया है. चेलानी ने पूछा है कि अगर तीन अमेरिकी नागरिकों की मौत हो जाती तब क्या होता?
चेलानी ने लिखा है, ''अगर किसी हवाई हमले में तीन अमेरिकी नाविक मारे जाते, तो अमेरिका में राजनीतिक संकट खड़ा हो जाता. लेकिन मंगलवार को होर्मुज़ स्ट्रेट के पास पलाऊ के झंडे वाले एक टैंकर पर अमेरिकी हवाई हमले में तीन भारतीय चालक दल के सदस्यों की मौत पर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बहुत कम ध्यान दिया गया है. प्रधानमंत्री मोदी ने इस हमले पर सार्वजनिक रूप से कोई टिप्पणी नहीं की है और मामला केवल विदेश मंत्रालय की ओर से दर्ज कराए गए एक नियमित कूटनीतिक विरोध तक सीमित रहा है.''

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अमेरिका के तर्कों का समर्थन?
चेलानी ने लिखा है, ''यह कोई अलग-थलग घटना नहीं थी. इस सप्ताह तीसरा ऐसा टैंकर था, जिस पर भारतीय चालक दल मौजूद था और अमेरिकी सेना ने निशाना बनाया. सोमवार को अमेरिकी नौसेना के एक F/A-18 सुपर हॉर्नेट लड़ाकू विमान ने ओमान की खाड़ी में एक अन्य टैंकर पर सटीक हथियारों से हमला किया. इसके बाद ओमानी अधिकारियों को उस पर सवार सभी 24 भारतीय नाविकों को निकालना पड़ा. फिर आज, ओमान के तट के पास गिनी-बिसाऊ के झंडे वाले एक टैंकर के इंजन पर अमेरिकी विमान ने दो हेलफायर मिसाइलें दागीं, जिससे जहाज़ में भीषण आग लग गई.''
जियोपॉलिटिकल मामलों के विश्लेषक ज़ोरावर दुलत सिंह ने लिखा है, ''अमेरिकी या पश्चिमी प्रतिबंधों और उनके घरेलू क़ानूनों को पूरी दुनिया के लिए मान्य नियमों के रूप में पेश किया जाता है. अंतरराष्ट्रीय क़ानून से ऊपर होने का यह अमेरिकी रवैया ही मौजूदा विश्व व्यवस्था में अंतरराष्ट्रीय संबंधों की सबसे बड़ी समस्या है और बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था की मांग के पीछे प्रमुख कारण भी. इसके बजाय भारत अब भी अमेरिकी आक्रामक कार्रवाई के तर्क को समझाने की कोशिश करता हुआ दिखाई दे रहा है.''
थिंक टैंक ग्लोबल ट्रेड रिसर्च इनिशिएटिव (जीटीआरआई) के निदेशक अजय श्रीवास्तव भी मानते हैं कि भारत की ख़ामोशी परेशान करने वाली है. श्रीवास्तव ने एक्स पर लिखा है, ''तीन भारतीय नाविक मारे गए हैं. अमेरिका ने अब तक एक बार भी सॉरी नहीं कहा है. आठ से 11 जून के बीच अमेरिकी बलों ने ओमान की खाड़ी के पास अंतरराष्ट्रीय जलक्षेत्र में तीन कारोबारी जहाज़ों पर हमला किया. इनमें से एमटी सेटेबेलो पर हुए हमले में तीन भारतीय नाविकों की मौत हो गई.''

''अगर किसी दूसरे देश ने कारोबारी जहाज़ों पर सवार भारतीय नाविकों को मार दिया होता, तो क्या भारत और दुनिया की इतनी ख़ामोश रहती? ये जहाज कारोबारी पोत थे, युद्धपोत नहीं. ये अंतरराष्ट्रीय जलक्षेत्र में संचालित हो रहे थे और किसी सैन्य संघर्ष का हिस्सा नहीं थे. इसके बावजूद अमेरिका ने एकतरफ़ा लागू की जा रही नाकेबंदी के तहत निशाना बनाया. नौ जून को सेटेबोलो पर हुआ हमला सबसे घातक था. एक अमेरिकी विमान ने जहाज़ के इंजन कक्ष को निशाना बनाया, जिससे तीन भारतीय नाविकों की मौत हो गई. अमेरिका के भू-राजनीतिक संघर्ष में भारतीय नागरिकों की जान चली गई.''
अंतरराष्ट्रीय क़ानून इस मामले में स्पष्ट है. संयुक्त राष्ट्र चार्टर का अनुच्छेद 2(4) आत्मरक्षा या संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की अनुमति के अलावा बल प्रयोग पर रोक लगाता है. अनुच्छेद 87 और 90 खुले समुद्र में नौवहन की स्वतंत्रता की गारंटी देते हैं. भारतीय नागरिकों की मौत के बाद भी अमेरिका ने न तो कोई सार्वजनिक माफ़ी मांगी है, न खेद व्यक्त किया है और न ही मृतकों के परिवारों के प्रति संवेदना जताई है. यह एक चिंताजनक संदेश देता है कि भारतीय जीवन शायद औपचारिक स्वीकार्यता के भी योग्य नहीं समझे गए.
अशोका यूनिवर्सिटी में अंतरराष्ट्रीय संबंधों के प्रोफ़ेसर कांति वाजपेयी ने लिखा है, ''भारत सही है या ग़लत, यह एक अलग बहस का विषय हो सकता है. लेकिन अमेरिका अब भारत को ऐसी शक्ति के रूप में नहीं देखता जिसे मज़बूत किया जाना चाहिए. इसके बजाय वह भारत को अपने उत्पादों, निवेश और हथियारों के लिए एक बड़े बाज़ार के रूप में देखता है. भविष्य आदर्शवाद का नहीं, बल्कि ठंडे दिमाग़ से किए जाने वाले लेन-देन और व्यावहारिक हितों की राजनीति का है.''

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भारत की प्रतिक्रिया
विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने गुरुवार को कहा, "हमने स्पष्ट किया है कि हमारे समुद्री कारोबार की सुरक्षा बहुत अहम है. जहाज़ों पर हो रहे ये हमले बंद होने चाहिए."
अमेरिकी सेंट्रल कमांड के अनुसार, अमेरिकी सेना ने बुधवार को पलाऊ के झंडे वाले तेल टैंकर सेटेबेलो पर कार्रवाई की क्योंकि उसने अमेरिकी बलों की चेतावनी का पालन नहीं किया था.
इसके बाद गुरुवार को अमेरिकी विमान ने गिनी-बिसाऊ के झंडे वाले जलवीर नामक टैंकर को भी निशाना बनाया. अमेरिकी सेंट्रल कमांड का आरोप है कि यह जहाज़ ओमान की खाड़ी के रास्ते ईरान से तेल ले जाने की कोशिश कर रहा था.
भारतीय अधिकारियों के अनुसार, जलवीर पर सवार सभी 20 भारतीय नाविक सुरक्षित हैं. रणधीर जायसवाल ने कहा कि हमले अमेरिकी नौसेना की ओर से किए गए थे और जिन जहाज़ों को निशाना बनाया गया वे भारतीय स्वामित्व वाले नहीं थे.
सेटेबेलो पर हमले के संबंध में अमेरिकी सेंट्रल कमांड के शुरुआती बयान में मौतों का कोई ज़िक्र नहीं था. अमेरिकी सेना ने कहा था कि एक जेट ने जहाज़ के इंजन को निशाना बनाकर हथियार दागे थे. जारी वीडियो में जहाज़ से धुआं उठता दिखाई देता है.
अमेरिकी सेंट्रल कमांड ने गुरुवार को फिर कहा कि जहाज़ के चालक दल ने बार-बार दी गई चेतावनी का पालन नहीं किया था और गोलीबारी से पहले कई चेतावनियां जारी की गई थीं.
भारतीय विदेश मंत्रालय ने शुरुआत में बताया था कि जहाज़ पर सवार 24 भारतीय चालक दल के सदस्यों में से 21 को बचा लिया गया है, जबकि तीन नाविक लापता हैं.
हालांकि, केंद्रीय पोर्ट्स, शिपिंग और जलमार्ग मंत्री सर्बानंद सोनोवाल ने गुरुवार को एक्स पर एक पोस्ट में बताया कि लापता तीनों भारतीय नाविकों के शव बरामद कर लिए गए हैं.

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अमेरिका की नाकेबंदी
उन्होंने कहा कि बचाए गए नाविकों के साथ-साथ मृतकों के पार्थिव शरीर भी भारत लाए जाएंगे.
इससे पहले सोमवार को अमेरिकी सेना ने पलाऊ के झंडे वाले मेरीवेक्स नामक टैंकर को निशाना बनाया था. इसकी जानकारी अमेरिकी सेंट्रल कमांड और भारतीय विदेश मंत्रालय दोनों ने दी थी.
अमेरिका का आरोप था कि यह जहाज़ ईरान के ख़िलाफ़ लागू नाकेबंदी का उल्लंघन करते हुए एक ईरानी बंदरगाह की ओर जाने की कोशिश कर रहा था.
भारतीय अधिकारियों ने इस सप्ताह बताया था कि गोलीबारी से पहले जहाज़ और अमेरिकी बलों के बीच संपर्क हुआ था.
उन्होंने यह भी कहा कि मेरीवेक्स पर मौजूद सभी भारतीय नाविकों को सुरक्षित बचा लिया गया था.
अमेरिका ने ईरान के साथ शुरुआती शांति वार्ता बेनतीजा ख़त्म होने के बाद उसकी अर्थव्यवस्था पर दबाव बढ़ाने के लिए 13 अप्रैल से नाकेबंदी शुरू की थी.
इस सप्ताह की घटनाएं ऐसे समय हुई हैं, जब एक अमेरिकी अपाचे हेलिकॉप्टर गिराए जाने के बाद अमेरिका और ईरान ने एक-दूसरे के सैन्य ठिकानों पर हमले फिर से शुरू कर दिए हैं. अमेरिका का दावा है कि हेलिकॉप्टर को ईरानी ड्रोन ने निशाना बनाया था.
अमेरिकी सेंट्रल कमांड के अनुसार, 13 अप्रैल को नाकेबंदी शुरू होने के बाद से अमेरिकी बल नौ ऐसे जहाज़ो को निष्क्रिय कर चुके हैं, जिन्होंने निर्देशों का पालन नहीं किया. इसके अलावा 100 से अधिक अन्य जहाज़ों का रास्ता भी बदलवाया गया है.
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