जस्टिस कौल क्यों बोले, 'सत्ता में मौजूद नेता नहीं चाहता कि उस पर कोई चेक एंड बैलेंस हो'

सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज जस्टिस संजय किशन कौल ने अपनी किताब 'विदाउट फ़ियर ऑर फ़ेवर' में न्यायपालिका की कार्यप्रणाली, जजों की नियुक्ति और न्यायपालिका की स्वतंत्रता से जुड़े मुद्दों पर चर्चा की है.
इस किताब की लॉन्चिंग से पहले ही संजय किशन कौल सुर्खियों में हैं. उन्होंने इस किताब में सुप्रीम कोर्ट के पूर्व चीफ़ जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ के साथ कुछ विषयों पर असहमति का भी ज़िक्र किया है.
उन्होंने अपनी किताब में लिखा है कि पूर्व चीफ़ जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम में न्यायाधीशों की नियुक्ति के लिए प्रस्तावित नामों पर औपचारिक चर्चा से पहले ही सरकार के साथ उन पर विचार-विमर्श करते थे. जस्टिस कौल को यह तरीका पसंद नहीं था.
बीबीसी संवाददाता विनीत भल्ला को दिए इंटरव्यू में जस्टिस कौल ने पूर्व चीफ़ जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ के साथ जजों की नियुक्ति की प्रक्रिया को लेकर मतभेदों और कॉलेजियम व्यवस्था की कमियों पर बात की.
कौल के मुताबिक, नियुक्तियों में पारदर्शिता और समयबद्ध प्रक्रिया की कमी की वजह से कई योग्य वकील जज बनने से हिचकते हैं.
उन्होंने कहा कि सरकारों की भूमिका नियुक्ति प्रक्रिया में विवाद का विषय रही है, जबकि न्यायिक फ़ैसलों में सरकार का हस्तक्षेप नहीं होना चाहिए. उन्होंने सुप्रीम कोर्ट में मामलों के आवंटन और सुनवाई के लिए बेंच तय करने की व्यवस्था में भी सुधार की ज़रूरत बताई.
किताब में उन्होंने अपनी न्यायिक यात्रा को कहानी के रूप में पेश करने की कोशिश की है. उन्होंने बताया कि इस बार उन्होंने आसान भाषा में लिखा है, ताकि यह किताब सिर्फ़ वकीलों तक सीमित न रहे, बल्कि आम लोग भी इसे आसानी से पढ़ सकें और उनकी कहानी समझ सकें.
पूर्व चीफ़ जस्टिस चंद्रचूड़ पर क्या बोले जस्टिस कौल

इमेज स्रोत, ANI
जस्टिस कौल के मुताबिक, उनकी मुलाक़ात चंद्रचूड़ से कॉलेज में हुई और उनके साथ उनका संबंध अच्छा रहा है.
जस्टिस ने बताया, "किताब में मैंने उनके साथ सहमति पर भी बात की है, लेकिन उसका ज़िक्र नहीं होता है."
जस्टिस कौल कहते हैं, "मैंने किताब में उनके बौद्धिक कौशल और काम करने की क्षमता की भी तारीफ़ की है. लेकिन कुछ मुद्दों पर हमारे बीच असहमति थी. इनमें एक बड़ा मुद्दा जजों की नियुक्ति का था. मेरा मानना था कि जब तक कॉलेजियम व्यवस्था लागू है, जजों की नियुक्ति पर फ़ैसला कॉलेजियम के भीतर ही होना चाहिए."
"इसके बाद सरकार से बातचीत हो सकती है, लेकिन पहले से मंज़ूरी लेने की व्यवस्था नहीं होनी चाहिए."
जस्टिस कौल ने कहा कि इस मुद्दे पर शायद उनकी सोच मुझसे थोड़ी अलग थी.
पीएमएलए केस उनसे लेने पर क्या बोले जस्टिस कौल
जस्टिस कौल ने प्रिवेंशन ऑफ़ मनी लॉन्ड्रिंग एक्ट (पीएमएलए) मामले के बारे में भी बात की.
उन्होंने बताया कि शुरुआत में यह मामला उनकी बेंच से दूसरी बेंच में इसलिए गया था, क्योंकि एक दूसरे जज ने सभी मामलों को अपनी बेंच के सामने एक साथ सुनवाई के लिए लाने की कोशिश की थी. ये मामले अलग-अलग बेंचों के पास थे.
उनमें से कुछ मामले जस्टिस कौल के पास भी थे.
जस्टिस कौल ने बताया, "जब मेरा केस उस बेंच के पास गया, तो उसमें बैठे जज साहब ने मुझे बताया कि यह केस उनके सामने कैसे आया. वह इस मामले की सुनवाई नहीं करना चाहते थे."
जस्टिस कौल ने कहा कि उन्होंने चीफ़ जस्टिस से पूछा था कि उनका केस दूसरी बेंच के पास कैसे गया. जस्टिस कौल के मुताबिक, रिटायरमेंट में कुछ महीने बचे होने के कारण उन्हें किसी ख़ास केस की सुनवाई में विशेष रुचि नहीं थी, लेकिन वे अपनी ज़िम्मेदारी से पीछे भी नहीं हटना चाहते थे.
उन्होंने बताया कि इसके बाद बेंच का दोबारा गठन किया गया, जिसकी अध्यक्षता जस्टिस कौल कर रहे थे.
जस्टिस कौल ने बताया कि उन्हें चीफ़ जस्टिस के कमरे में बुलाया गया था, जहां यह बात उठी कि वकीलों समेत कई लोग उनकी आलोचना कर रहे हैं कि वे इस केस की सुनवाई क्यों करना चाहते हैं.
जस्टिस कौल ने कहा, "मुझे लगा कि इसके पीछे सरकार भी हो सकती है, क्योंकि निजी पक्ष तो चाहता था कि मैं इस मामले की सुनवाई करूँ. मेरा अधिकार क्षेत्र सिर्फ़ इतना था कि मैं यह देखूँ कि क्या इस मामले में कोई ऐसा मुद्दा है, जिसे बड़ी बेंच के पास भेजा जाना चाहिए या नहीं."
उन्होंने बताया कि उनसे बीच का रास्ता अपनाने के लिए कहा गया था. उनके मुताबिक, बीच का रास्ता यह था कि वे इस केस की सुनवाई न करें.
'जुडिशरी में ख़ामियां हैं, ये तो कोई भी मना नहीं करेगा'

इमेज स्रोत, Getty Images
जस्टिस कौल ने कहा है कि न्यायपालिका में कुछ ख़ामियां हैं और जजों की नियुक्ति प्रक्रिया को सुव्यवस्थित करना बेहद ज़रूरी है. उन्होंने कहा कि जजों की कमी के कारण मामलों का बोझ बढ़ता है और लोगों को समय पर न्याय नहीं मिल पाता.
जस्टिस कौल ने कहा, "जुडिशरी में कुछ ख़ामियां हैं, इससे कोई इनकार नहीं करेगा."
उन्होंने जजों की ईमानदारी पर सवाल उठाने वालों के जवाब में कहा कि जज भी उसी समाज का हिस्सा हैं, जहां से दूसरे लोग आते हैं. ऐसे में न्यायपालिका में भी कुछ अपवाद हो सकते हैं.
उन्होंने कहा कि व्यवस्था में चेक एंड बैलेंस होने के बावजूद ऐसी स्थितियां सामने आती हैं.
उन्होंने अपनी किताब का ज़िक्र करते हुए कहा कि इसका एक मक़सद न्यायपालिका की कार्यप्रणाली को लोगों के लिए समझना आसान बनाना था.
उनके मुताबिक, न्यायपालिका को अक्सर एक रहस्यमयी व्यवस्था की तरह देखा जाता है, जबकि इसमें सकारात्मक पहलुओं के साथ-साथ ख़ामियां भी हैं. उन्होंने कहा, "काम भी तो हुआ है ना."
जस्टिस कौल ने कहा कि जजों की नियुक्ति में देरी और ख़ाली पदों के कारण न्यायपालिका की क्षमता प्रभावित होती है. उन्होंने बताया कि जजों की कुल स्वीकृत संख्या के मुक़ाबले वास्तविक संख्या लगभग 70 फ़ीसदी रहती है.
रिटायर होने वाले जजों की जगह नए जज नियुक्त किए जाने के बावजूद यह स्थिति कई सालों से बनी हुई है. उन्होंने कहा कि इस समस्या को दूर करने के लिए नियुक्ति प्रक्रिया में बदलाव करना होगा.
इसके साथ ही, जस्टिस कौल ने हाई कोर्ट के जजों की रिटायरमेंट उम्र बढ़ाकर 65 साल करने का सुझाव दिया. उन्होंने कहा कि इससे हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के जजों की रिटायरमेंट उम्र एक जैसी हो जाएगी और न्यायपालिका को अनुभवी जजों की सेवाएं तीन साल और मिल सकेंगी.
जस्टिस कौल ने नियुक्ति प्रक्रिया सुधारने के लिए सरकार के सामने रखा था प्रस्ताव

इमेज स्रोत, ANI
जस्टिस कौल के मुताबिक, उनकी बेंच ने जजों की नियुक्ति प्रक्रिया को व्यवस्थित करने के लिए सरकार के सामने अलग-अलग चरणों की समयसीमा तय करने का प्रस्ताव रखा था.
इसमें इंटेलिजेंस ब्यूरो (आईबी) की रिपोर्ट, राज्य सरकारों की टिप्पणियों, कॉलेजियम की प्रक्रिया और नियुक्ति तक की समयसीमा शामिल थी.
उन्होंने कहा कि इस मामले में करीब 70 से 80 फ़ीसदी तक सफलता मिली थी, लेकिन बाद में यह मामला आगे नहीं बढ़ा.
उन्होंने अफ़सोस जताया कि तत्कालीन चीफ़ जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ ने बिना कारण बताए इस मामले को उनकी बेंच से हटा दिया.
जस्टिस कौल ने कहा, "किसी मामले को लंबे समय तक लंबित रखने से अनिश्चितता और आशंकाएं पैदा होती हैं."
वहीं, मास्टर ऑफ रोस्टर यानी मामलों को अलग-अलग बेंचों में आवंटित करने के चीफ़ जस्टिस के अधिकार पर जस्टिस कौल ने कहा कि उन्हें इस शक्ति से नहीं, बल्कि इसके इस्तेमाल के तरीक़े से कुछ आपत्तियां थीं.
उनके मुताबिक, सुप्रीम कोर्ट में रोस्टर प्रकाशित होने के बाद मामलों को तय व्यवस्था के अनुसार संबंधित बेंच के सामने जाना चाहिए.
उन्होंने कहा कि रजिस्ट्री और चीफ़ जस्टिस के बीच केंद्रित इस व्यवस्था में पारदर्शिता की कमी से आशंकाएं पैदा हो सकती हैं.
चार वरिष्ठ जजों की 2018 की प्रेस कॉन्फ़्रेंस पर जस्टिस कौल ने आलोचना करते हुए कहा कि इससे अदालत के भीतर मतभेद सार्वजनिक हो गए, लेकिन उनके मुताबिक इसका कोई बड़ा सकारात्मक नतीजा नहीं निकला.
लेकिन अपनी किताब में अदालत के भीतर की बात दुनिया के सामने लाने के सवाल पर उन्होंने कहा कि यह न्यायपालिका की कार्यप्रणाली का बाद में किया गया आकलन है. इसका मक़सद व्यवस्था की अच्छी और ख़राब बातों को सामने लाना है.
किताब के राजनीतिक इस्तेमाल पर क्या कहा?
किताब के राजनीतिक इस्तेमाल की आशंका पर जस्टिस कौल ने कहा कि न्यायपालिका पर सरकारी दबाव का मुद्दा किसी एक सरकार तक सीमित नहीं है.
उन्होंने कहा कि कॉलेजियम व्यवस्था जजों की नियुक्ति को राजनीतिक दबाव से अलग रखने के लिए बनी थी.
जस्टिस कौल के मुताबिक, "जो भी राजनीतिज्ञ सत्ता में आता है, वह नहीं चाहता कि उस पर कोई चेक एंड बैलेंस हो."
उन्होंने कहा कि लोकतंत्र में न्यायपालिका की भूमिका सत्ता पर नियंत्रण और संतुलन बनाए रखना है.
उन्होंने यह भी कहा कि अदालतों को राजनीतिक लड़ाई का मंच बनाने के बजाय कानूनी मुद्दों पर ध्यान देना चाहिए.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.
BBC World Service के नए ऐप को डाउनलोड करें
BBC News हिन्दी को चुनें और पाइए न्यूज़ अलर्ट, लाइव टीवी, पॉडकास्ट... सब एक जगह
कृपया नोट करें: नया ऐप ब्रिटेन और अमेरिका में उपलब्ध नहीं है.






















