भरूच की 700 साल पुरानी जुमा मस्जिद की जगह क्या कभी जैन मंदिर था? कोर्ट पहुंचा विवाद

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- Author, अजित गढ़वी
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
- प्रकाशित
- पढ़ने का समय: 9 मिनट
भरूच की ऐतिहासिक जुमा मस्जिद को लेकर चल रहे विवाद ने अब एक नया मोड़ ले लिया है.
करीब 700 साल पुरानी मानी जाने वाली इस मस्जिद की जगह कभी जैन तीर्थस्थल होने का दावा करते हुए गुजरात हाई कोर्ट में एक याचिका दायर की गई है.
महाराष्ट्र का एक संप्रदाय पहले से इस जगह पर अपना दावा करता रहा है. अब इस विवाद में जैन पक्ष भी शामिल हो गया है.
गुजरात हाई कोर्ट ने भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण यानी एएसआई से मामले की जांच करने को कहा है. अदालत ने केंद्र सरकार से भी जवाब मांगा है.
दावा- मस्जिद के तहख़ाने से देवी-देवताओं की मूर्तियां मिलीं
इस पूरे मामले में पांच लोगों ने गुजरात हाई कोर्ट में याचिका दायर कर इस इमारत को जैन मंदिर घोषित करने की मांग की है.
उनका दावा है कि वास्तव में यह जगह 'अश्वबोध तीर्थ' और 'शकुनिका विहार' के नाम से जानी जाती थी. उनका यह भी कहना है कि यहां उनके तीर्थंकर मल्लीनाथ की प्रतिमा मौजूद है.
भरूच की जुमा मस्जिद को 'जुमी मस्जिद' भी कहा जाता है. इसे लेकर पिछले कुछ वर्षों से विवाद चल रहा है. फ़िलहाल यह जगह एएसआई के नियंत्रण में है.
मार्च में कुछ लोग कथित तौर पर ज़बरदस्ती मस्जिद में घुस गए थे. कुछ महिलाओं ने वहां नारियल और दूसरी चीज़ें रखकर पूजा करने की कोशिश भी की थी. इसके वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हुए थे.
इसके बाद जून में कथित तौर पर मस्जिद के तहख़ाने का एक वीडियो वायरल हुआ. वीडियो में दावा किया गया कि मस्जिद के तहख़ाने से देवी-देवताओं की मूर्तियां मिली हैं.
अब मामला हाई कोर्ट पहुंचने के बाद ये समझना ज़रूरी है कि इस ऐतिहासिक इमारत को लेकर अलग-अलग पक्ष क्या दावा कर रहे हैं और उपलब्ध जानकारी इसके इतिहास के बारे में क्या बताती है?
याचिकाकर्ताओं की क्या मांग है?

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बीबीसी ने जब इस जगह का दौरा किया तो वहां चौकीदार और एएसआई की ओर से नियुक्त अधिकारी मौजूद थे.
मस्जिद में पांचों वक़्त की नमाज़ पढ़ी जाती है. हाल में हुए विवाद के बाद यहां आने वाले प्रत्येक व्यक्ति का नाम और फ़ोन नंबर दर्ज किया जाता है. इसके बाद ही उसे अंदर जाने दिया जाता है.
कुछ इतिहासकारों के मुताबिक भरूच की जुमा मस्जिद का निर्माण 14वीं सदी में हुआ था.
जैन पक्ष का दावा है कि मस्जिद परिसर में उनके 19वें तीर्थंकर मल्लीनाथ की प्रतिमा मौजूद है. याचिकाकर्ताओं की मांग है कि इस प्रतिमा की रक्षा की जाए और उन्हें वहां पूजा करने का अधिकार दिया जाए.
याचिका दायर करने वालों में दिल्ली के रहने वाले हरिशंकर जैन, राहुल दीवान और तीन अन्य लोग शामिल हैं.
जैन पक्ष का दावा है कि 14वीं सदी में ग़यासुद्दीन तुग़लक़ के शासन के दौरान यहां मस्जिद बनाई गई थी.
उनका कहना है कि मस्जिद में मंदिरों जैसा नक्काशी का काम दिखाई देता है. इसके अलावा यहां हाथी और घोड़ों की आकृतियां और नृत्य करती महिलाओं की मूर्तियां भी मौजूद हैं.
हाई कोर्ट में दायर याचिका में कहा गया है कि भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण ने 1909 में जुमा मस्जिद को संरक्षित इमारत घोषित किया था. यह राष्ट्रीय महत्व की इमारतों की सूची में भी शामिल है.
फ़िलहाल इसका रखरखाव प्राचीन स्मारकों और पुरातत्व स्थलों से जुड़े 1958 के क़ानून के तहत किया जाता है. इसलिए इसकी मौजूदा स्थिति को बदला नहीं जा सकता.
इस मामले की अगली सुनवाई 22 अक्तूबर को होनी है.
अलग-अलग पक्ष क्या कह रहे हैं?

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हाई कोर्ट में याचिका दायर करने वालों में शामिल हरिशंकर जैन ने बीबीसी गुजराती से कहा कि वह देश में कई जगहों पर इस तरह के मंदिरों को वापस पाने के लिए क़ानूनी लड़ाई लड़ रहे हैं.
उन्होंने कहा, "एक दौर में मंदिरों को तोड़कर उनकी जगह मस्जिदें बनाई गई थीं. भरूच की यह इमारत वास्तव में एक जैन मंदिर है."
"हमने अदालत में जो याचिका दायर की है, उसमें मस्जिद की तस्वीरें भी लगाई हैं. इन तस्वीरों में देवी-देवताओं की मूर्तियां दिखाई देती हैं."
हरिशंकर जैन का दावा है, "मस्जिद में एक तहख़ाना है, जिसमें अब भी बहुत सारी मूर्तियां रखी हुई हैं."
लेकिन जुमा मस्जिद के ट्रस्टी इमरान पटेल इस इमारत के इतिहास के बारे में अलग बात कहते हैं.
उन्होंने बीबीसी से कहा कि यह मस्जिद पहले से ही जामिया मस्जिद के नाम से जानी जाती थी.
वह कहते हैं, "जब भरूच की पहचान एक बंदरगाह के रूप में होती थी, तब बाहर से मुस्लिम व्यापारी यहां आए थे. उस समय के शासक ने उन्हें मस्जिद बनाने के लिए जगह दी थी."
इमरान पटेल के मुताबिक़, "मस्जिद का निर्माण बहुत धीमी रफ़्तार से हो रहा था, क्योंकि उस समय मस्जिद बनाने वाले स्थानीय कारीगर नहीं मिलते थे."
"उस समय बाज़ार में मंदिरों का मलबा भी मिलता था. इसलिए शासक ने जैन मंदिर के मलबे का इस्तेमाल करने की अनुमति दी थी. लेकिन यहां किसी मंदिर को तोड़ा नहीं गया था."
मौजूदा विवाद पर इमरान पटेल ने कहा, "यह सब बाहर के कुछ लोगों के इशारे पर हो रहा है. कुछ लोग भरूच की शांति बिगाड़ने की कोशिश कर रहे हैं."
"हमें अभी तक इस विवाद में पक्ष नहीं बनाया गया है."
मस्जिद के तहख़ाने से मूर्तियां मिलने के दावे पर उन्होंने कहा, "यह इमारत एएसआई के नियंत्रण में है. यहां से एक पत्थर भी नहीं हटाया जा सकता."
"हो सकता है कि पहले कभी किसी खंभे में पत्थर का कोई टुकड़ा बदला गया हो और उस पर उनके भगवान की आकृति हो. वह अलग बात है. लेकिन इसे राजनीतिक मुद्दा बनाने की कोशिश की गई है."
महाराष्ट्र के एक संप्रदाय का भी अलग दावा

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जुमा मस्जिद से जुड़ा यह विवाद केवल जैन और मुस्लिम पक्ष तक सीमित नहीं है.
इस मामले में महाराष्ट्र से संचालित महानुभाव पंथ भी एक पक्ष है. इस पंथ की स्थापना चक्रधर स्वामी ने की थी.
महानुभाव पंथ का दावा है कि यह मस्जिद कभी उसके संस्थापक स्वामी चक्रधर का जन्मस्थान थी.
यह पंथ महाराष्ट्र में अधिक सक्रिय है.
छत्रपति संभाजीनगर के महानुभाव देवस्थान ट्रस्ट के सचिव सुदर्शन नागराज कपाटे ने एक बार दावा किया था, "इस जगह पर हमारे गुरु स्वामी चक्रधर का जन्म हुआ था."
उन्होंने यह भी दावा किया, "यह जगह 12वीं सदी का हमारा पूजास्थल है. इसे तोड़कर यहां मस्जिद बनाई गई थी."
कपाटे ने पहले बीबीसी गुजराती से कहा था, "चक्रधर स्वामी भरूच के राजपरिवार के विशालदेव के बेटे थे. उनका मूल नाम हरिपालदेव था."
"जब उनका निधन हुआ तो द्वारका के बड़े संत चांगदेव राउल की आत्मा उनके शरीर में आ गई थी. इसके बाद उन्होंने महाराष्ट्र में महानुभाव पंथ की स्थापना की. यह उन्हीं स्वामी चक्रधर का जन्मस्थान है."
कपाटे का कहना है कि हरिपालदेव का जन्म जैन परंपरा का पालन करने वाले परिवार में हुआ था. इसलिए इस जगह को 'समली विहार जैन मंदिर' भी कहा जाता है.
हालांकि, उनकी इन बातों का कोई पुरातात्विक आधार उपलब्ध नहीं है.
भरूच ज़िले के कलेक्टर की वेबसाइट के मुताबिक़, जुमा मस्जिद का निर्माण 14वीं सदी में हुआ था.
बीबीसी गुजराती ने प्रतिक्रिया के लिए दोबारा सुदर्शन नागराज कपाटे से संपर्क किया. शुरुआत में वह अपनी प्रतिक्रिया देने के लिए तैयार हो गए थे.
लेकिन इसके तुरंत बाद उन्होंने कहा कि वह भरूच के शंकराचार्य मठ के मुक्तानंद स्वामी के साथ हैं और उनके मार्गदर्शन में ही काम करते हैं. इसलिए इस मामले में मुक्तानंद स्वामी जो भी कहेंगे, वह उससे सहमत हैं.
कपाटे का कहना है कि वे चार साल से आंदोलन चला रहे हैं.
मुक्तानंद स्वामी का क्या कहना है?

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इस विवाद में मुक्तानंद स्वामी का नाम भी सामने आता है. वह भरूच में नर्मदा नदी के किनारे बने एक आश्रम में रहते हैं.
संन्यासी बनने से पहले उनका नाम भावेश पटेल था.
साल 2007 के अजमेर दरगाह विस्फोट मामले में उन्हें सज़ा हुई थी. साल 2017 में एक ट्रायल कोर्ट ने उन्हें उम्रक़ैद की सज़ा सुनाई थी. लेकिन 2018 में राजस्थान हाई कोर्ट ने उन्हें ज़मानत दे दी थी.
इसी दौरान उन्होंने भगवा वस्त्र पहन लिए और अपना नाम मुक्तानंद स्वामी रख लिया.
अजमेर दरगाह में हुए विस्फोट में तीन लोगों की मौत हुई थी और 15 लोग घायल हुए थे.
मुक्तानंद स्वामी ने बीबीसी से कहा, "भरूच की कथित जुमा मस्जिद वास्तव में चक्रधर स्वामी का जन्मस्थान है. हम इस जगह का मूल स्वरूप बचाए रखने की कोशिश कर रहे हैं."
उन्होंने दावा किया, "यह जगह एएसआई के तहत आती है, लेकिन यहां पुरातत्व विभाग के नियम लागू नहीं किए जा रहे हैं."
"मस्जिद में वज़ूख़ाना बनाया गया है, पानी के नल लगाए गए हैं और क़ब्रिस्तान में शव दफ़न किए जाते हैं. इन कामों की अनुमति नहीं होने के बावजूद ये किए जा रहे हैं. हम इसका विरोध कर रहे हैं."
यह पूछे जाने पर कि वह भरूच की जुमा मस्जिद को जैन मंदिर क्यों मानते हैं, मुक्तानंद स्वामी ने कहा, "वहां की नक्काशी और वहां बनाई गई दूसरी आकृतियां किसी मस्जिद में नहीं मिलतीं. मस्जिद या इस्लाम का मूर्तियों से कोई संबंध नहीं है."
हालांकि, संन्यास लेने से पहले से उनके ख़िलाफ़ चल रहे मामले के बारे में वह बात करने के लिए तैयार नहीं हुए.
जुमा मस्जिद का इतिहास क्या है?

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अलग-अलग पक्षों के इन दावों के बीच जुमा मस्जिद का दर्ज इतिहास क्या कहता है?
भरूच की जुमा मस्जिद अपनी ऐतिहासिक पृष्ठभूमि के कारण जानी जाती है.
भरूच ज़िले के बारे में जानकारी देने वाली गुजरात सरकार की वेबसाइट के मुताबिक़, जुमा मस्जिद का निर्माण 14वीं सदी में एक प्राचीन जैन मंदिर के अवशेषों से किया गया था.
भरूच के क़िले की तलहटी के पास मौजूद इस मस्जिद का ढांचा 14वीं सदी की शुरुआत यानी करीब 1300 ईस्वी में बनाया गया था.
इस इमारत में तीन बड़े गुंबद और कुल 48 खंभे हैं. इन खंभों को ब्रैकेट पैटर्न में बनाया गया है.
गुजरात सरकार की वेबसाइट के मुताबिक़, इस मस्जिद के निर्माण में बड़े पैमाने पर मंदिर से जुड़ी सामग्री और मलबे का इस्तेमाल किया गया था. हालांकि, इसे मस्जिद के सिद्धांतों के अनुसार बनाया गया था.
मस्जिद बनाने के लिए मुस्लिम निरीक्षकों से मार्गदर्शन लिया गया था. लेकिन निर्माण का काम स्थानीय मज़दूरों ने किया था, जिन्होंने शायद इससे पहले कभी कोई मस्जिद नहीं देखी थी.
गुजरात सरकार की वेबसाइट पर यह भी बताया गया है कि मस्जिद में तीन तरफ़ प्रवेश द्वार वाला एक परिसर है और पश्चिम की ओर गर्भगृह मौजूद है.
एएसआई ने क्या कहा?

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जुमा मस्जिद से जुड़ा विवाद अदालत पहुंचने के बाद भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण की आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं मिल सकी है.
लेकिन जब मस्जिद के तहख़ाने में उतरकर वीडियो बनाने की घटना हुई थी, तब एएसआई के वडोदरा सर्कल के सुपरिंटेंडेंट डॉक्टर शुभ मजूमदार ने इतना कहा था, "यह इमारत सभी लोगों के लिए खुली है. किसी को भी यहां आने से नहीं रोका गया है."
इससे पहले पुरातत्व विभाग के अधिकारी रिज्जू घोष ने बीबीसी गुजराती से कहा था, "जब से यह स्मारक और पुरातात्विक स्थल एवं अवशेष अधिनियम, 1958 के दायरे में आया है, तब से यह मस्जिद के रूप में है."
"इससे पहले यह किस रूप में था, इस बारे में मैं कुछ नहीं कह सकता."
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.
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