सलीम मलिक ने जब इमरान ख़ान से नाराज़गी की वजह से भारतीय गेंदबाज़ों की थी धुनाई

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- Author, रशीद शकूर
- पदनाम, वरिष्ठ खेल पत्रकार
- ........से, कराची
- प्रकाशित
- पढ़ने का समय: 12 मिनट
पाकिस्तान के पूर्व टेस्ट क्रिकेटर सलीम मलिक की स्टाइलिश बल्लेबाज़ी के बारे में इंग्लैंड के पूर्व क्रिकेटर डेविड गॉवर ने एक बहुत ख़ूबसूरत बात कही थी.
"ऐसा लगता था कि वह मखमल (वेलवेट) के दस्ताने पहनकर बल्लेबाज़ी करते हैं."
कलाई के इस्तेमाल से खेले गए सलीम मलिक के ख़ूबसूरत शॉट्स और उनकी कई यादगार पारियां आज भी प्रशंसकों को याद हैं. लेकिन अफ़सोस कि दुनिया उनकी शानदार बल्लेबाज़ी के बजाय उन्हें एक दूसरी वजह से ज़्यादा याद करती है.
इसीलिए मशहूर शायर शेफ़्ता का यह मिसरा याद आता है. "बदनाम अगर होंगे तो क्या नाम न होगा."
लेकिन सच यह है कि सलीम मलिक के शानदार करियर के कई पहलू आज भी लोगों की नज़रों से ओझल हैं. इनका संबंध उनकी कई बेहतरीन पारियों और यादगार प्रदर्शनों से है.
किस बात पर नाराज़ थे सलीम मलिक?
इस सवाल का जवाब जानने से पहले सलीम मलिक की उस पारी का विस्तार से ज़िक्र हो जाए, जो शतक या दोहरे शतक न होने के बावजूद वनडे अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट के इतिहास की कुछ यादगार पारियों में गिनी जाती है.
18 फ़रवरी 1987 को कोलकाता के ईडन गार्डन्स में बैठे लगभग 80 हज़ार दर्शक पाकिस्तान और भारत के वनडे मैच में कृष्णमाचारी श्रीकांत की आक्रामक बल्लेबाज़ी देख चुके थे. वह पाकिस्तान की गेंदबाज़ी पर हावी रहे थे. लेकिन दर्शकों के लिए अभी एक और शानदार पारी देखना बाक़ी था.
जब पाकिस्तान ने भारत के बनाए 238 रनों के जवाब में बल्लेबाज़ी शुरू की, तो एक के बाद एक गिरते विकेटों ने उसे जीत से दूर कर दिया. हालाँकि रमीज़ राजा और 39 वर्षीय यूनुस अहमद ने टीम को 106 रनों की अच्छी शुरुआत दिलाई थी. यूनुस अहमद 17 साल बाद अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट में लौटे थे. लेकिन 161 रनों पर पाकिस्तान के 5 विकेट गिर चुके थे.
असल ड्रामा इसके बाद शुरू हुआ, जब इस कहानी के मुख्य किरदार सलीम मलिक की एंट्री हुई. इसके बाद उन्होंने भारतीय गेंदबाज़ों के साथ जो सलूक किया, उसे कभी भुलाया नहीं जा सकता.
कोई भी गेंदबाज़ उन्हें क़ाबू करने में कामयाब नहीं हो सका.
कपिल देव, मदन लाल और मनिंदर सिंह तो जैसे उनके रडार पर आ चुके थे.
इनमें से हर एक के एक-एक ओवर में तीन-चार बाउंड्री लगना जैसे आम बात हो गई थी.
इस पारी में सिर्फ़ एक मौक़ा ऐसा आया था, जब भारत को सलीम मलिक का विकेट मिल सकता था. लेकिन लगभग 30 रन के स्कोर पर मनिंदर सिंह की गेंद पर विकेटकीपर चंद्रकांत पंडित स्टंपिंग का मौक़ा चूक गए थे.
चंद्रकांत पंडित अपनी इस ग़लती को कभी नहीं भूल पाए.
उन्होंने अपने एक इंटरव्यू में बताया था.
"सलीम मलिक मनिंदर सिंह की गेंद को ऑन ड्राइव करने के लिए क्रीज़ से बाहर निकल गए थे. गेंद मेरे ग्लव्ज़ में आकर निकल गई और सलीम मलिक को क्रीज़ में वापस आने का मौक़ा मिल गया था. आप कह सकते हैं कि हम यह मैच उसी वक़्त हार गए थे."
अब हम इस बात पर आते हैं कि आख़िर सलीम मलिक को किस बात का ग़ुस्सा था, जो उन्होंने भारतीय गेंदबाज़ों पर उतारा. तो यह बात उन्हीं की ज़ुबानी सुनिए.
"इस दौरे पर मुझसे रन नहीं बन रहे थे. इसकी एक वजह मेरा बल्लेबाज़ी क्रम भी था, जो बहुत नीचे था.
एक दिन मुझे मुदस्सर नज़र ने बताया कि कप्तान इमरान ख़ान तुम्हें दौरे से वापस भेजने के बारे में सोच रहे हैं.
मैंने मुदस्सर नज़र से कहा कि मुझे एक बार बल्लेबाज़ी क्रम में ऊपर खेलने के लिए भिजवा दें, ताकि मैं कुछ कर सकूँ.
मुदस्सर ने कहा कि मैं कप्तान से बात करता हूँ.
कोलकाता के वनडे में इमरान ख़ान ने मुझे वन-डाउन पोज़िशन पर पैड पहनने के लिए कहा.
लेकिन मैं यह देखकर हैरान रह गया कि वन-डाउन पर मियांदाद, फिर अब्दुल क़ादिर और उनके बाद मंज़ूर इलाही को बल्लेबाज़ी के लिए भेज दिया गया.
मैं जैसे ही उठता, वह मुझे लगातार बैठने का इशारा करते रहते थे."

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सलीम मलिक कहते हैं.
"मुझे इमरान ख़ान पर बहुत ग़ुस्सा था कि वन-डाउन से होते-होते मैं सातवें नंबर पर बल्लेबाज़ी करने गया.
मेरे सामने इमरान ख़ान भी कपिल देव की गेंद पर बोल्ड हो गए थे. उन्हें कभी यह बात पसंद नहीं थी कि वह कपिल देव की गेंद पर आउट हों."
सलीम मलिक बताते हैं.
"जब इमरान ख़ान आउट होकर जा रहे थे, तो मैंने उनसे पूछा, 'कप्तान, अब क्या करना है?'
इमरान ख़ान का ग़ुस्से में जवाब था, 'जो मर्ज़ी करना है, वह करो.'
और फिर जो कुछ करना था, वह सलीम मलिक ने ही किया. उन्होंने पाकिस्तान को आख़िरी ओवर में नाटकीय जीत दिला दी.
उन्होंने सिर्फ़ 36 गेंदों पर 72 रन नाबाद बनाए थे.
बोथम ने किस तरह मज़ाक़ उड़ाया.
सलीम मलिक 1992 विश्व कप का फ़ाइनल भी नहीं भूलते, जिसमें वह सिर्फ़ एक गेंद खेलने के लिए बल्लेबाज़ी करने आए थे.
सलीम मलिक कहते हैं.
"जब मेरी बल्लेबाज़ी आई, तो पारी की आख़िरी गेंद बाक़ी थी.
मुझे याद है कि जब मैं वापस आ रहा था, तो इंग्लैंड के खिलाड़ी पीछे से मुझ पर फ़िकरे कस रहे थे.
बोथम मज़ाक़ में आवाज़ लगा रहे थे, 'वेल डन, वेल प्लेड.'
उन्हें इस बात पर हैरानी थी कि मैंने इस विश्व कप से पहले ग्राहम गूच की काउंटी एसेक्स की तरफ़ से एक सीज़न में लगभग दो हज़ार रन बनाए थे. लेकिन मुझे फ़ाइनल में सही तरीक़े से बल्लेबाज़ी करने का मौक़ा नहीं मिला था."
कोलकाता से भी बेहतर पारी कौन सी?
सलीम मलिक बीबीसी हिंदी से बात करते हुए कहते हैं.
"आम तौर पर लोग मेरी कोलकाता वाली पारी को ही मेरी सबसे बेहतरीन पारी मानते हैं. लेकिन व्यक्तिगत रूप से मुझे 1988 में वेस्ट इंडीज़ के ख़िलाफ़ पोर्ट ऑफ़ स्पेन वनडे की पारी बहुत पसंद है.
उस मैच में मैंने कोर्टनी वॉल्श, कर्टली एम्ब्रोज़, पैटरसन और बेंजामिन जैसे ख़तरनाक गेंदबाज़ों के सामने 85 रन बनाए थे."
'वक़्त कम है, जल्दी से शतक पूरा कर लो'

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सलीम मलिक ने अपने टेस्ट करियर की शुरुआत ऐसे समय में की थी, जब पाकिस्तान टीम के लगभग सभी खिलाड़ियों ने जावेद मियांदाद की कप्तानी में खेलने से इनकार कर दिया था.
इसके नतीजे में पाकिस्तान क्रिकेट बोर्ड ने श्रीलंका के ख़िलाफ़ कराची टेस्ट में चार नए खिलाड़ियों को टेस्ट कैप दी थी. इनमें सलीम मलिक भी शामिल थे.
सलीम मलिक पहली पारी में सिर्फ़ 12 रन बना सके थे. लेकिन दूसरी पारी में उन्होंने शानदार शतक बनाया था.
वह पदार्पण टेस्ट में शतक बनाने वाले उस समय दुनिया के सबसे कम उम्र के टेस्ट क्रिकेटर बन गए थे.
सलीम मलिक बीबीसी हिंदी से बात करते हुए पुरानी यादों को ताज़ा करते हैं.
"मुझे याद है कि चौथे दिन मैं 79 रन पर नाबाद था.
पाँचवें और आख़िरी दिन कप्तान जावेद मियांदाद 92 रन पर आउट हो गए थे.
उन्होंने मुझसे कहा कि तुम्हारे पास समय कम है, क्योंकि हमें पारी घोषित करके श्रीलंका को आउट भी करना है. इसलिए तुम जल्दी से शतक पूरा कर लो.
ज़ाहिर है कि मेरे लिए पदार्पण मैच में शतक बनाने का सुनहरा मौक़ा था, जिसे मैं गंवाना नहीं चाहता था.
लेकिन मैच की स्थिति को देखते हुए मुझे तेज़ बल्लेबाज़ी करनी पड़ी थी. मुझे कुछ जोखिम भरे शॉट भी खेलने पड़े थे.
लेकिन मैंने वह शतक पूरा कर लिया था. इसके बाद मियांदाद ने पारी घोषित कर दी थी."
कोच की वह सलाह जो ज़िंदगी भर काम आई
सलीम मलिक की उम्र सिर्फ़ 12 साल थी, जब उनके बड़े भाई उन्हें इक़बाल पार्क ले गए थे. वहाँ विक्टोरियस क्लब की टीम खेला करती थी.
उस समय वह लेग स्पिन गेंदबाज़ी करते थे. लेकिन कोच रब नवाज़ ने उनमें मौजूद बल्लेबाज़ी की प्रतिभा को पहचान लिया.
उन्होंने सलीम मलिक को सलाह दी कि कट और हुक शॉट जोखिम भरे होते हैं. इनमें आउट होने का ख़तरा ज़्यादा रहता है.
इसलिए तुम कोशिश करो कि सामने 'वी' में खेलो.
सलीम मलिक ने इस सलाह को गाँठ बाँध ली थी. वह लगातार इसी पर अमल करते रहे.
सलीम मलिक कहते हैं.
"मेरी फ़ील्डिंग में सुधार लाने में कोच रब नवाज़ का भी बहुत महत्वपूर्ण योगदान था. वह नियमित रूप से फ़ील्डिंग की प्रैक्टिस करवाया करते थे."
सलीम मलिक ने अपनी शानदार फ़ील्डिंग की एक झलक भारत के ख़िलाफ़ बेंगलुरु टेस्ट में भी दिखाई थी.
लेफ़्ट आर्म स्पिनर इक़बाल क़ासिम उस ऐतिहासिक टेस्ट को याद करते हुए कहते हैं.
"सलीम यूसुफ़ ने उस मुश्किल विकेट पर कमाल की विकेटकीपिंग की थी. जबकि सलीम मलिक लेग साइड पर इतने सतर्क थे कि गावस्कर जैसे बल्लेबाज़ भी सिंगल को डबल में बदलने का जोखिम नहीं ले रहे थे.
सलीम मलिक ने लेग साइड के बड़े हिस्से को कवर किया हुआ था.
गेंद जहाँ भी जाती, वह वहाँ पलक झपकते ही पहुँच जाते थे. फिर एक ही हरकत में गेंद पकड़कर थ्रो कर देते थे.
मैंने ऐसी फ़ील्डिंग बहुत कम देखी है."
वसीम अकरम से कपड़े धुलवाने का आरोप.
वसीम अकरम ने अपनी किताब सुल्तान में ऐसा लगता है कि किसी भी साथी क्रिकेटर को नहीं बख़्शा. उन्होंने लगभग हर किसी के बारे में कोई न कोई विवादित बात कही है.
सलीम मलिक के बारे में उन्होंने लिखा है कि अपने पहले ही दौरे पर उन्होंने उनसे अपने कपड़े और जूते साफ़ करवाए थे. साथ ही मालिश भी करवाई थी.
सलीम मलिक इस आरोप पर हँसते हुए कहते हैं.
"जब भी कोई टीम दौरे पर जाती है, तो कपड़े वगैरह धुलवाने के लिए बाक़ायदा लॉन्ड्री की सुविधा होती है.
तो भला मैं कैसे वसीम या किसी भी क्रिकेटर से कह सकता था कि मेरे कपड़े धो दो या मालिश कर दो.
मुझे वसीम अकरम जैसे समझदार व्यक्ति से इस तरह की बातों की उम्मीद नहीं थी.
यह सब सिर्फ़ किताब बेचने के लिए किया जाता है, ताकि उसमें कुछ न कुछ सनसनीखेज़ सामग्री डाल दी जाए."
वसीम और वक़ार को संभालना कितना मुश्किल?
जब खिलाड़ियों ने वसीम अकरम की कप्तानी में खेलने से इनकार कर दिया था, तब आम धारणा यही थी कि वक़ार यूनुस को कप्तान बना दिया जाएगा. लेकिन सलीम मलिक को कप्तान बना दिया गया था. और जब वह कप्तान बने, तो वसीम और वक़ार ने उनसे बात करना बंद कर दिया था.
सलीम मलिक कहते हैं, "उस समय टीम में दो गुट बने हुए थे.
वसीम अकरम को कप्तानी से हटाए जाने के बाद आम धारणा यही थी कि वक़ार यूनुस को कप्तान बना दिया जाएगा, क्योंकि ज़्यादातर खिलाड़ी उनके साथ थे.
लेकिन पीसीबी के प्रमुख आरिफ़ अली ख़ान अब्बासी ने मुझे बुलाया और पूछा कि तुम्हें कप्तान बना रहे हैं. क्या तुम खिलाड़ियों को संभाल लोगे?
मैंने कहा, 'जी बिल्कुल. लेकिन मैं किसी की बदतमीज़ी बर्दाश्त नहीं करूँगा.'
मैं कप्तान तो बन गया, लेकिन समस्या यह थी कि वसीम और वक़ार मुझसे बात करने के लिए तैयार नहीं थे.
न्यूज़ीलैंड के दौरे पर जब मैंने वसीम अकरम को गेंद दी, तो उसने मुँह दूसरी तरफ़ फेर लिया.
मैंने उससे सिर्फ़ यह कहा कि देखो, तुम दुनिया के बहुत बड़े गेंदबाज़ हो.
अगर तुम अच्छा प्रदर्शन नहीं करोगे, तो दूसरी तरफ़ से वक़ार पाँच विकेट ले लेगा.
तुम्हें अपनी साख भी बनाए रखनी है.
इसी तरह जब मैंने वक़ार यूनुस की तरफ़ गेंद बढ़ाई, तो उसने भी मुझसे बात नहीं की और मुँह दूसरी तरफ़ कर लिया.
मैंने उससे भी यही बात कही कि देखो, तुम्हारे सामने वसीम अकरम है.
तुम अच्छा प्रदर्शन करोगे, तो उसका फ़ायदा किसी और को नहीं बल्कि तुम्हें और टीम को होगा.
यही वह रणनीति थी, जिससे मैंने इन दोनों की क्षमताओं का भरपूर फ़ायदा उठाया.
दोनों ने उस पूरे दौर में इतनी शानदार गेंदबाज़ी की कि किसी तीसरे गेंदबाज़ को विकेट लेने का बहुत कम मौक़ा मिलता था.
इसे आप मेरी मैन मैनेजमेंट कह सकते हैं कि किस खिलाड़ी से किस तरह काम लेना होता है."
गैटिंग-शकूर राना विवाद
क्रिकेट इतिहास के इस बड़े विवाद के बारे में आम तौर पर यही पढ़ने को मिलता है कि अंपायर शकूर राना ने माइक गैटिंग की उस हरकत पर आपत्ति जताई थी, जिसमें वह गेंदबाज़ के गेंद फेंकने के दौरान अपने फ़ील्डर की पोज़िशन बदल रहे थे. यह क्रिकेट के क़ानून के ख़िलाफ़ था.
लेकिन यह बात बहुत कम लोगों को मालूम होगी कि शकूर राना का ध्यान इस तरफ़ किसने दिलाया था.
सलीम मलिक बताते हैं.
"मैं एडी हेमिंग्स की गेंदबाज़ी पर बल्लेबाज़ी कर रहा था. तभी मैंने देखा कि माइक गैटिंग, डेविड कैपेल को चुपचाप फ़ील्ड पोज़िशन बदलने का इशारा कर रहे हैं. वह लेग साइड पर अपनी असली पोज़िशन छोड़ देता था.
मैंने ही लेग अंपायर शकूर राना का ध्यान इस तरफ़ दिलाया था.
इस पर उन्होंने गैटिंग से कहा कि यह बेईमानी है.
इसके बाद दोनों के बीच ज़बरदस्त बहस हुई थी और मैच रोकना पड़ा था.
सारा क़ुसूर गैटिंग का था. उसने पहले क्रिकेट के क़ानूनों का उल्लंघन किया और फिर अपनी ग़लती मानने के बजाय अंपायर से उलझ पड़ा."
मैच फ़िक्सिंग के दलदल में फँस गए

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जस्टिस फ़ख़रुद्दीन जी. इब्राहिम ने सलीम मलिक को मैच फ़िक्सिंग के उन आरोपों से बरी कर दिया था, जो ऑस्ट्रेलियाई क्रिकेटरों शेन वॉर्न, टिम मे और मार्क वॉ ने लगाए थे.
लेकिन जस्टिस एजाज़ यूसुफ़ ने उन्हीं आरोपों के आधार पर उन्हें पाकिस्तान टीम से बाहर रखने की सिफ़ारिश की थी.
इसके बाद जस्टिस मलिक मुहम्मद क़य्यूम के न्यायिक आयोग ने उन पर आजीवन प्रतिबंध लगाने की सिफ़ारिश कर दी थी.
उस सिफ़ारिश पर अमल होने के बाद क्रिकेट के दरवाज़े उनके लिए हमेशा-हमेशा के लिए बंद हो गए.
सलीम मलिक पर यह प्रतिबंध वर्ष 2000 में लगाया गया था.
अक्टूबर 2008 में लाहौर की सिविल अदालत ने उन पर लगाए गए इस प्रतिबंध को ख़त्म करने का फ़ैसला सुनाया था.
इसके बाद यह उम्मीद जगी थी कि वह कोचिंग के ज़रिए इस खेल से अपना संबंध फिर से स्थापित कर सकेंगे.
इसी सिलसिले में नवंबर 2008 में यह ख़बर भी आई थी कि पीसीबी के चेयरमैन एजाज़ बट ने सलीम मलिक को नेशनल क्रिकेट अकादमी में कोचिंग की ज़िम्मेदारी सौंपने का फ़ैसला कर लिया था.
लेकिन सलीम मलिक के लिए यह ख़ुशी सिर्फ़ कुछ पलों की ही साबित हुई.
सलीम मलिक बताते हैं.
"अदालत से प्रतिबंध हटने के बाद मेरी मुलाक़ात पीसीबी के चेयरमैन एजाज़ बट से हुई थी.
मैंने उनसे कह दिया था कि आपके आस-पास जो लोग हैं, वे आपको मेरे बारे में डराएँगे.
इस पर बट साहब ने कहा, 'मुझे कौन डरा सकता है?'
लेकिन अगले ही दिन जब मैं एजाज़ बट साहब से दोबारा मिला, तो उन्होंने मुझसे कहा, 'कुछ दिन इंतज़ार कर लो.'"
सलीम मलिक की वापसी की राह में एक बड़ी रुकावट आईसीसी का वह प्रश्नपत्र बताया जाता है, जो उन्हें पाकिस्तान क्रिकेट बोर्ड के माध्यम से दिया गया था.
उन्हें कहा गया था कि आप इसके जवाब दें.
इसका संबंध उनकी उस बातचीत से था, जिसे अप्रैल 2000 में न्यूज़ ऑफ़ द वर्ल्ड ने एक स्टिंग ऑपरेशन के तहत रिकॉर्ड किया था.
सलीम मलिक का कहना है कि उन्होंने जवाब पाकिस्तान क्रिकेट बोर्ड को दे दिए थे. लेकिन उनके अनुसार उन्हें ख़ारिज कर दिया गया.
इस मामले में एक महत्वपूर्ण मोड़ उस समय आया, जब 2020 में पाकिस्तान क्रिकेट बोर्ड के एक स्वतंत्र निर्णायक जस्टिस (सेवानिवृत्त) फ़ज़ल मीराँ चौहान ने सलीम मलिक की अपील सुनी थी.
अपने फ़ैसले में दूसरी बातों के अलावा उन्होंने लिखा था कि संदिग्ध व्यक्तियों के साथ सलीम मलिक की इस बातचीत के ट्रांसक्रिप्ट का मूल टेप से सत्यापन नहीं किया गया है.
जस्टिस फ़ज़ल मीराँ चौहान के ग्यारह पन्नों के फ़ैसले में यह दर्ज है कि पीसीबी ने इस संबंध में मूल टेप या कोई गवाह पेश नहीं किया.
चूँकि पीसीबी सलीम मलिक के ख़िलाफ़ सिर्फ़ ट्रांसक्रिप्ट पर निर्भर कर रहा है, इसलिए उसे साबित करने की ज़िम्मेदारी पीसीबी की है.
चूँकि ट्रांसक्रिप्ट की रिकॉर्डिंग साबित नहीं है, इसलिए इसका इस्तेमाल अपीलकर्ता के ख़िलाफ़ नहीं किया जा सकता.
सलीम मलिक ने आजीवन प्रतिबंध के फ़ैसले के ख़िलाफ़ सिविल कोर्ट, हाई कोर्ट, यहाँ तक कि सुप्रीम कोर्ट का भी दरवाज़ा खटखटाया.
उन्होंने न जाने कितना पैसा वकीलों और क़ानूनी लड़ाई पर ख़र्च कर दिया.
यहाँ पीसीबी के पूर्व चेयरमैन तौक़ीर ज़िया का यह बयान ग़ौर करने लायक़ है.
"अगर सलीम मलिक ने वसीम अकरम की तरह अच्छा वकील किया होता, तो वह उनका मुक़दमा ज़्यादा प्रभावी तरीक़े से लड़ सकता था."
याद रहे कि वसीम अकरम ने पंजाब के पूर्व गवर्नर तारिक़ रहीम की सेवाएँ अपने वकील के रूप में ली थीं.
लेकिन सलीम मलिक ने भी कोई साधारण वकील नहीं किए थे.
उनमें से एक पंजाब के पूर्व गवर्नर शाहिद हमीद भी थे.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.
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