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ब्लॉग
 - 
Manikant Thakur
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<description>यह बीबीसी हिंदी का ब्लॉग है. आप यहाँ विभिन्न विषयों पर बीबीसी संवाददाताओं के ब्लॉग पढ़ सकते है</description>
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<lastBuildDate>Tue, 01 Jan 2013 17:07:13 +0530</lastBuildDate>
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	<title>नीतीश-मोदी का बिहारी मायाजाल!</title>
	<description><![CDATA[<p>दिल्ली में वर्षांत एक बर्बर यौन हिंसा के संताप में गुज़रा. बीते बरसों में बिहार ने भी ऐसे दंश झेले हैं.</p>

<p>गए साल और नए साल के बीच आधी रात को जब झटके से घड़ियाँ तारीख़ बदल रही थीं, तब ' हैप्पी न्यू ईयर' का शोर हमारे शहर में इस बार भी हुआ. लेकिन दिल्ली बलात्कार कांड के ताज़ा ज़ख्म से ग़मज़दा माहौल वाली मायूसी प्रायः हर जगह दिखी.</p>

<p>बहरहाल, लौटता हूँ अपनी पेशागत ज़िम्मेदारियों की तरफ.</p>

<p>ज़ाहिर है कि बिहार के बारे में ही कुछ बातें करना चाहता हूँ. ख़ासकर इस विषय पर कि वर्ष 2013 में इस राज्य के सियासी समीकरण और संबंधित जन-रुझान बदलने के आसार हैं या नहीं.</p>

<p>मेरे ख़याल में यहाँ न सिर्फ राज्य सरकार से आम लोगों की नाराज़गी बढ़ी है, बल्कि सत्ता साझीदार जनता दल यूनाइटेड (जदयू) और भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) का तालमेल अंदरूनी संकट में फंसा है.</p>

<p>मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने राज्य की अपनी पिछली यात्राओं के दौरान जैसा उग्र जन-विरोध झेला, उससे उनको अपने दलीय जनाधार की औकात का सही अंदाज़ा लगा होगा. इसलिए बिहार को विशेष राज्य का दर्जा दिए जाने की मांग पर जनसमर्थन जुटाने संबंधी उनकी वह यात्रा-मुहिम राज्य की ज्वलंत समस्याओं के हाथों पिट गई.</p>

<p>यही कारण था कि भाजपा से सम्बन्ध-विच्छेद का तेवर बढ़-चढ कर दिखाते आ रहे जदयू नेताओं का रवैया इस बदले माहौल में नरम दिखने लगा.</p>

<p>पर अब जदयू को उस नरमी में गर्मी पैदा करने की मजबूरी सताने लगी है. कारण है कि गुजरात में लगातार तीसरी चुनावी जीत ने नरेन्द्र मोदी को भाजपा में प्रधानमंत्री पद के दावेदार वाली ताक़त दे दी है.</p>

<p>नीतीश कुमार पहले ही ऐलान कर चुके हैं कि नरेन्द्र मोदी को अगर भाजपा आगामी लोकसभा चुनाव में प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार बनायेगी तो जदयू बिना देर किये भाजपा से अलग हो जाएगा.</p>

<p>ऐसे में दो ही बातें हो सकती हैं. एक ये कि भाजपा एनडीए को एकजुट रखने के लिए इस बाबत नरेन्द्र मोदी के बजाय अपने किन्हीं और नेता के नाम पर सहमति बना ले.</p>

<p>दूसरी बात कि ऐसा नहीं होने पर नीतीश कुमार को एनडीए से बाहर किसी नए राजनीतिक समीकरण से जुड़ना होगा.</p>

<p>यह मुमकिन नहीं लगता कि हर हाल में नीतीश कुमार भाजपा से चिपके रहेंगे. लेकिन मुमकिन यह ज़रूर लगता है कि जुगाड़ लगाकर भाजपा के बिना भी नीतीश कुमार यहाँ अपनी सरकार बचा लें और वर्ष 2014 के लोकसभा चुनाव में अपनी सियासी ताक़त आजमायें.</p>

<p>बिहार विधानसभा में बहुमत के लिए जदयू को सिर्फ चार विधायकों की ज़रुरत है और यहाँ कांग्रेस के कुल चार विधायकों पर जदयू की नज़र है भी. राष्ट्रीय जनता दल (राजद) भी टूट की शंका से मुक्त नहीं हैं.</p>

<p><br />
लोग ये भी जानते हैं कि भाजपा में नीतीश कुमार के विरोध और समर्थन वाले दो अलग-अलग ख़ेमे बने हुए हैं. उपमुख्यमंत्री और भाजपा नेता सुशील मोदी का अतिशय नीतीश प्रेम किसी से छिपा नहीं है.</p>

<p>मतलब लोकसभा चुनाव से पहले, यानी वर्ष 2013 में बिहार की राजनीति किसी भी आकस्मिक उलटफेर से लोगों को चौंका सकती है.</p>

<p>क्या पता कि यहाँ सत्ता पक्ष में जदयू और मुख्य विपक्ष में भाजपा नज़र आ जाए! हालाँकि इन दोनों दलों के अन्तःपुर से जुड़े कुछ लोग दबी ज़बान एक अलग ही कहानी सुनाते हैं.</p>

<p>उनके मुताबिक़ नीतीश और नरेन्द्र मोदी के बीच का विवाद सत्ता राजनीति के गूढ़ खेल का हिस्सा है. ना तो मोदी प्रधानमंत्री पद के प्रत्याशी बनेंगे और ना ही नीतीश भाजपा का साथ छोड़ेंगे.</p>

<p>उनका निचोड़ यह है कि बिहार में थोक मुस्लिम मतदाता फिर लालू के खाते में ना खिसक जाय, जदयू-भाजपा की बस यही रणनीति है. इसलिए नरेन्द्र मोदी के विरोध का दिखावा जारी रहेगा.</p>

<p>तो क्या कांग्रेस के साथ लालू प्रसाद के राजद का स्वाभाविक-सा दिख रहा संबंध आगामी चुनाव में भी क़ायम रहेगा? या फिर अचानक कांग्रेस के साथ नीतीश की युगलबंदी जैसा कोई नया गुल खिलेगा?</p>

<p>दोनों सवालों का सूत्र इस बात से जुड़ा है कि राज्य के मुस्लिम मतदाताओं का ध्रुवीकरण किस गठबंधन के साथ ज्यादा हो सकता है.</p>

<p>लालू यादव की हालिया जनसभाओं में जुटी अच्छी-ख़ासी भीड़ से उनके विरोधियों के कान खड़े हुए हैं जबकि लालू -राबडी शासन काल का स्याह पक्ष अभी भी पूरी तरह मिट नहीं पाया है.</p>

<p>उधर नीतीश कुमार ने तो कांग्रेस के लिए एक गुंजाइश उछाल ही दी है कि केंद्र का जो सियासी गठबंधन बिहार को विशेष राज्य का दर्जा देना स्वीकारेगा, जदयू उसका समर्थन करेगा.</p>

<p>सच यह भी है कि नीतीश कुमार को प्रधानमंत्री पद के योग्य ठहराने के लिए माहौल निर्माण का भरपूर प्रयास हुआ और हो रहा है.</p>

<p>लेकिन राज्य में बढ़ते अपराध, भ्रष्टाचार और अनेक योजनाओं में घपले-घोटालों के आंकड़े सबूत बनकर सामने आ रहे हैं. उन से आँख मिलाना इस सरकार के लिए मुश्किल होता जा रहा है. मार्केटिंग और मीडिया मैनेजमेंट की मदद से जो विकास की सुनहली परत वाली छवि चमकाई गई थी, उसकी कलई पिछले एक साल में तेज़ी से उतरने लगी है .<br />
</p>]]></description>
         <dc:creator>Manikant Thakur 
Manikant Thakur
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	<pubDate>Tue, 01 Jan 2013 17:07:13 +0530</pubDate>
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