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<title>
ब्लॉग
 - 
वुसतुल्लाह ख़ान
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<description>यह बीबीसी हिंदी का ब्लॉग है. आप यहाँ विभिन्न विषयों पर बीबीसी संवाददाताओं के ब्लॉग पढ़ सकते है</description>
<language>hi</language>
<copyright>Copyright 2010</copyright>
<lastBuildDate>Tue, 27 Jul 2010 14:13:01 +0530</lastBuildDate>
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	<title>कुछ तो सीखिए</title>
	<description><![CDATA[<p>मुझे दुख होता है कि जब किसी देश में यह ख़बर आती है कि फ़लां सेनाध्यक्ष को नौकरी से निकाल दिया गया या फ़लां जनरल का कोर्ट मॉर्शल हो गया.</p>

<p>अब बांगलादेश को ही लीजिए. आज़ादी के 39 बरस में 15 जरनलों को सेनाध्यक्ष का पद दिया गया. सेनाध्यक्ष रहते हुए उन में से तीन के कान पकड़ कर राजनैतिक सरकार ने नौकरी से निकाल दिया और दो सेनापतियों की हत्या हो गई. उस का नुक़सान यह हुआ कि शेख़ हसीना और ख़ालिदा ज़िया आपस में लड़ती रहती हैं और कोई बीच बचाव कराने वाला नहीं होता.</p>

<p>भारत में भी वर्तमान कुछ अच्छा नहीं है. 63 साल में मजाल है किसी एक चीफ़ को भी इस क़ाबिल समझा गया हो कि उन्हें फुल एक्सटेन्शन दे दी जाए. केवल एक ऐसा उदारहण है कि जब उदारता का सुबूत देते हुए श्रीमती गाँधी ने फ़ील्ड मॉर्शल मानेक शाह को छह महीने की एक्सटेन्शन दी थी. वह भी इसलिए कि उन्होंने बांगलादेश बनवा कर दिया था.</p>

<p>बाद में आने वाली सरकारों ने तो इतनी मुर्रवत भी न दिखाई. 1998 में वाजपेयी सरकार ने चेयरमैन ज्वाइंट चीफ़्स ऑफ़ स्टाफ़ कमेटी चीफ ऑफ़ नेवल स्टाफ़ को केवल इस बात पर घर भिजवा दिया कि उन्होंने सरकारी फ़ैसले पर अमल न करते हुए एक एडमिरल को अपना डिप्टी बनाने से इंकार कर दिया था.</p>

<p>मनमोहन सरकार तो इस मामले में वाजपेयी सरकार से भी दो हाथ आगे निकल गई. 2008 में एक मेजर जनरल की नौकरी इस बात पर तेल हो गई कि वे एक महिला कैप्टेन को योगा सिखाते सिखाते गोया कुछ ज़्यादा ही सिखा गए. </p>

<p>फिर 2009 में दार्जिलिंग में फौजी ज़मीन के तीन एकड़ अपने दोस्त को अलॉट करने के आरोप में एक लेफ़्टिनेंट जनरल और एक मेजर जनरल का कोर्ट मॉर्शल कर उन्हें निकाल दिया गया. </p>

<p>एक लेफ़्टिनेंट जनरल के ख़िलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई की गई और एक अन्य की बतौर डिप्टी चीफ ऑफ़ आर्मी स्टाफ़ की नियुक्ति रोक दी गई.</p>

<p>भला यह कैसा लोकतंत्र है जहाँ नेता जो चाहे कर गुज़ारें और बच निकलें. और एक बेचारे जनरल से ज़रा भी ग़ल्ती हो जाए या कोई ऊंधी सीधी बात मूँह से निकल जाए तो उसे घर भेज दिया जाए.</p>

<p>इस से पाकिस्तान अच्छा है जहाँ कई चीफ़्स ऑफ़ आर्मी स्टाफ़ ने सिविलयन सरकार की नीतियों की आलोचना की लेकिन सरकारों ने उफ़ न ही. क्योंकि उन का मानना था कि जनरल और नेता एक ही सिक्के के दो रुख़ हैं और दोनों ही जनता के विकास और रक्षा को प्रीय रखते हैं.</p>

<p>इसलिए एक दूसरे के साथ साथ बराबरी से चलना चाहिए. इस सफर में कभी कोई आगे पीछे भी हो जाए तो बुरा नहीं मानना चाहिए.</p>

<p>इसलिए पाकिस्तान में चीफ ऑफ़ आर्मी स्टाफ़ से कभी ज़बरदस्ती नहीं की जाती. उन से तीन साल बाद पूछा जाता है कि हुज़ूर रिटायर होना पसंद करेंगे या जनता की ओर सेवा करने के लिए पदे पर रहेंगे. यही रवैया है असल में लोकतंत्र का. </p>

<p>इसी मिसाली तालमेल के कराण पाकिस्तान में 63 सालों के भीतर केवल 14 चीफ ऑफ़ आर्मी स्टाफ़ आए और भारत को 63 सालों में 26 चीफ़्स ऑफ़ आर्मी स्टाफ़ लाने पड़े.</p>

<p>अगर भारतीय सरकारें भी अपने चीफ़्स को नेताओं के बराबर सम्मान देतीं और उन्हें अपने बराबर बिठातीं तो आज उसे यह दिन न देखना पड़ता कि यही फैसला नहीं हो पा रहा कि माओवादियों से कैसे निपटा जाए. राजैनिक तरीक़े या बमबारी करके....<br />
</p>]]></description>
         <dc:creator>वुसतुल्लाह ख़ान 
वुसतुल्लाह ख़ान
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	<link>https://bbcbreakingnews.pages.dev/blogs/hindi/2010/07/post-111.html</link>
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	<category></category>
	<pubDate>Tue, 27 Jul 2010 14:13:01 +0530</pubDate>
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	<title>कृष्णा क़ुरैशी बैठक</title>
	<description><![CDATA[<p>कौन माई का लाल कहता है कि एसएम कृष्णा और शाह महमूद क़ुरैशी का वार्तालाप सफल नहीं रहा. पहली बार ऐसा हुआ कि एसएम कृष्णा इस्लामाबाद के बेनज़ीर इंटरनेशनल एयरपोर्ट पर उतरे तो उन के स्वागत के लिए नया क़ालीन बिछाया गया.</p>

<p>दोनों विदेश मंत्रियों ने इस बात पर सहमति जताई कि डिनर में जो खाने परोसे गए वह स्वादिष्ट थे और इसी तरह से खानों से दोनों देशों के बीच विश्वास और बढ़ेगा.</p>

<p>जिस गाड़ी में शाह महमूद क़ुरैशी और एसएम कृष्णा राष्ट्रपति ज़रदारी और प्रधानमंत्री गिलानी से मिलने गए उस गाड़ी के एसी की ठंडक की मेहमान विदेश मंत्री ने प्रशंसा की और प्रस्ताव दिया कि इस तरह से एसी बनाने वाली फैकट्री में साझा निवेश में भारत और पाकिस्तान के बीच आर्थिक संबंधों को बढ़ावा मिल सकता है. </p>

<p>शाह महमूद क़ुरैशी ने श्री कृष्णा की भावनाओं की प्रशंसा करते हुए प्रस्ताव दिया कि इस परियोजना के लिए एमओयू की स्क्रिप्ट को अगली मुलाक़ात में डिस्कस किया जा सकता है.</p>

<p>जब दोनों विदेश मंत्री संयुक्त प्रेस कांफ़्रेस करने के लिए पाँच घंटे पत्रकारों को इंतिज़ार कराने के बाद मुस्कराते हुए हॉल में पहुँचे तो एक कर्मचारी ने मुझे एक कोने में ले जा कर बताया कि कृष्णा-क़ुरैशी बातचीत इसलिए लंबी हो गई क्योंकि इस में बहुत सा एजेंडा कवर किया गया.</p>

<p>मसलन जिस मेज़ के इर्द गिर्द दोनों प्रतिनिधिमंडल बैठे उस की बनावट विस्तार से डिस्कस की गई. कृष्णा जी यह भी जानना चाहते थे कि क़ुरैशी साहब चाय में दो चम्मच चीनी किस लिए डालते हैं. </p>

<p>उस अवसर पर क़ुरैशी साहब ने यह प्रस्ताव दिया कि अगली बार जब भी भारत और पाकिस्तान के डेलीगेशन मिलेंगे तो दोनों डेलीगेशन के लोग बग़ैर चीनी के चाय पिएँगे ताकि दक्षिण एशिया से ग़रीबी के ख़ात्मे के लिए ग़ैर-ज़रूरी ख़र्चों में कमी की शुरुआत हो सके.</p>

<p>मैंने उस कर्मचारी से कहा कि मगर हम तो समझ रहे थे कि मुंबई, कश्मीर, आतंकवाद, अफग़ानिस्तान, सियाचिन, सर क्रीक, न्यूक्लियर...... उस कर्मचारी ने मेरी बात काटते हुए कहा, ओहो... आप पत्रकार लोग जब भी सोचेंगे बुरा ही सोचेंगे... अरे भाई यह कोई डिस्कस करने की बातें हैं. हज़ार बार तो इन विषयों पर बात हो चुकी है. इंडिया को इस बारे में पाकिस्तान का पक्ष मालूम है और पाकिस्तान को इंडिया का. तो फिर समय बरबाद करने का क्या मतलब? भला डेडलॉक तोड़ने का इस से अच्छा एजेंडा और क्या हो सकता था जो कृष्णा क़ुरैशी ने डिस्कस किया..... </p>

<p>हाँ, तो मैं आप को बता रहा था कि दोनों शिष्टमंडलों ने इस बात पर भी सहमति जताई कि सांस्कृतिक संबंधों को आगे बढ़ाने के लिए अगली समग्र वार्ता में रवि शंकर और मेंहदी हसन को भी शामिल किया जाए.... और राग बागेश्वरी और झंजोटी को आम करने के लिए दोनों देशों.....</p>

<p>(माफी चाहता हूँ मैं उस कर्मचारी की पूरी बात नहीं सुन सका क्योंकि प्रेस कॉंफ़्रेंस ख़त्म होने से पहले ही मीडिया चाय की मेज़ की तरफ लपक चुका था. और दोनों विदेश मंत्रियों के चेहरे फ्लैश गनों की लपक झपक में टिमटिमा रहे थे.)..<br />
</p>]]></description>
         <dc:creator>वुसतुल्लाह ख़ान 
वुसतुल्लाह ख़ान
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	<link>https://bbcbreakingnews.pages.dev/blogs/hindi/2010/07/post-109.html</link>
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	<category></category>
	<pubDate>Fri, 16 Jul 2010 18:43:55 +0530</pubDate>
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	<title>एक दिन पिता का....</title>
	<description><![CDATA[<p>अभी इसी महीने दुनिया के 58 देशों में फ़ादर्स डे यानी पिता-दिवस मनाया गया. दुनिया के बाक़ी देश अपने अपने पिता के हिसाब से जनवरी से नवंबर तक विभिन्न तिथियों में यह दिवस मनाते हैं. </p>

<p>लेकिन जितने जोश और उत्साह के साथ दुनिया में मदर्स डे मनाया जाता है और जिस शिद्दत से बच्चे माता दिवस का इंतिज़ार करते हैं और जैसे-जैसे उपहार उस दिन संतान की ओर से मां को मिलते हैं वैसा उत्साह और जोश और इस प्रकार के उपहार बहुत कम पिता के हिस्से में आते हैं.</p>

<p>बल्कि ऐसा लगता है कि पूरे उत्साह और जोश के साथ मदर्स डे मनानी वाली संतान फ़ादर्स डे इसलिए मुरव्वत में मना लेती है कि पिता जी के वंचित रह जाने का भाव कुछ कम हो सके.</p>

<p>देहात और निम्न मध्यम वर्ग में तो आज भी पिता बड़ी हद तक एक डिक्टेटर का किरदार निभाता है. परिवार के दैनिक और दूरगामी फ़ैसले उसी के हाथों में होते हैं. इसलिए वहां अलग से पिता-दिवस मनाने की न तो ज़रूरत होती है और न ही हिम्मत.</p>

<p>ऐसे दिवस बनाने के चोंचेले मध्य वर्ग को बहुत अच्छे लगते हैं और इसके ठोस कारण भी हैं. जिस प्रकार लोकतंत्रिक देशों में राष्ट्रपति या राजा को राष्ट्र का प्रतीक मानकर सिर्फ़ इज़्ज़त दी जाती है और आधिकार प्रधानमंत्री और उसकी मंत्री मंडल के हाथों में होती है उसी प्रकार मध्य वर्ग परिवार में पिता की पारंपरिक और सांकेतिक हैसियत होती है. </p>

<p>उसे माँ का पति होने के नाते एक्स ऑफ़िशियो पिता का दर्जा मिल जाता है (जैसे मौसा, फूफा, ताई, मामी की पारिवारिक महत्ता होती है).</p>

<p>पिता की बुनियादी अहमियत सिर्फ़ तीन अवसरों पर माँ से ज़्यादा होती है. एक उस समय जब आईकार्ड और अन्य क़ानूनी दस्तावेज़ों में पिता का नाम लिखना हो. दूसरे उस समय जब बेटे या बेटी का रिश्ता तय करने में उसे प्रमुख रोल निभाने के लिए बैठना नसीब हो और तीसरे उस समय में जब संतान को घर से बाहर किसी झगड़े में अपने दुशमन को बहुत ही गहरी गाली देने के लिए न चाहते हुए भी दुश्मन के परिवार से अपने पिता का सांकेतिक रिश्ता जोड़ना पड़ जाए.<br />
 <br />
बाक़ी अन्य मौक़ों पर पिता के पास बिलों पर हस्ताक्षर करने के अलावा कोई अधिकार नहीं होता. </p>

<p>कहने को इस दुनिया का समाज पिता प्रधान समाज है मगर इससे ज़्यादा ग़लत प्रोपैगैंडा संभव नहीं है. जिसे आप पैतृक समाज समझ रहे हैं ये वास्तविकता में आज भी माता प्रधान समाज है. </p>

<p>विश्वास न हो तो कहीं भी किसी भी दिन इस सवाल पर रेफ़्रेंडम करा कर देख लें कि अगर आपको माँ और पिता में से किसी एक के साथ रहने का मौक़ा मिले तो आप क्या करेंगे. 99 फ़ीसदी संतान किस के हक़ में फ़ैसला देगी ये आप भी जानते हैं. </p>

<p>ऐसे माहौल में अगर पिता के आंसू पोछने के लिए हर साल जून के तीसरे रविवार को फ़ादर्स डे मना भी लिया जाए तो क्या फ़र्क़ पड़ता है. 364 दिन तब भी माँ और उसकी संतान के ही रहेंगे.</p>]]></description>
         <dc:creator>वुसतुल्लाह ख़ान 
वुसतुल्लाह ख़ान
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	<link>https://bbcbreakingnews.pages.dev/blogs/hindi/2010/06/post-103.html</link>
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	<category></category>
	<pubDate>Tue, 22 Jun 2010 13:59:32 +0530</pubDate>
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<item>
	<title>बाहर कुछ अंदर कुछ</title>
	<description><![CDATA[<p>जब से एक नाईजिरियाई अपने अंडरवियर में बारूद छिपा कर एक अमरीकी विमान पर सवार होते पकड़ा गया है उस के बाद से अमरीकियों ने हर एयरपोर्ट पर फुल बॉडी सर्च के लिए स्कैनिंग मशीन लगाने का फ़ैसला लिया है.</p>

<p>यह ख़बर सुन कर मुझे एक वाक़्या याद आ रहा है कि 1943 में जब दूसरा विश्व युद्ध अपने चरम पर था तो अंग्रेज़ों ने हिंदुस्तान में तुरंत सैनिकों की भरती का कार्यक्रम शुरु कर दिया. कई शहरों की तरह लाहौर में भी किराए के एक टांगे पर लगे लाउड स्पीकर पर घोषणा शुरु हो गई कि सेना में भरती के केंद्र पर 18 साल से ऊपर के युवक इंटरव्यू के लिए आएं. </p>

<p>कामयाब उम्मीदवारों को अच्छा वेतन, मेडिकल सुविधा, मुफ़्त राशन, मुफ़्त वर्दी और विदेश यात्रा का अवसर मिलेगा और रिटायरमेंट के बाद पेंशन भी.</p>

<p>उस ज़माने में युद्ध की वजह से बेरोज़गारी बहुत ज़्यादा थी इसलिए युवक बड़ी संख्या में फ़ौजी भरती केंद्र पर जाने लगे. </p>

<p>एक फौजी डॉक्टर भरती केंद्र पर उम्मीदवारों की प्रारंभिक मेडिकल जांच कर रहा था. जब डॉक्टर ने एक युवक से कहा कपड़े उतारो तो युवक ग़ुस्से में आकर कहने लगा. तुसी लोग बाहर वर्दी, मुफ़्त राशन ते तनख़्वाह दी गल करदे हो ते अंदर कपड़े उतारदे हो.</p>

<p>मुझे फ़ुल बॉडी सर्च पर कोई आपत्ति नहीं क्योंकि मेरे पास भी वही कुछ है जो भगवान ने किसी भी यात्री को दिया है. </p>

<p>अमरीकी आप्रवासन अधिकारी ने यह भी आश्वासन दिया है कि फ़ुल बॉडी सर्च का रिकॉर्ड स्कैनिंग के तुरंत बाद डिलीट कर दिया जाएगा. </p>

<p>फिर भी मुझे डर है कि उन्होंने स्कैनिंग रिकॉर्ड डिलीट न किया तो मैं क्या करूँगा. अगर मैं अट्ठारह बीस साल का युवक होता तो मुझे इस की भी परवाह न होती कि अमरीकी मेरी बॉडी स्कैनिंग का रिकॉर्ड डिलीट करें या घर ले जाएँ. </p>

<p>मैं ख़ुशी ख़ुशी अहमद फराज़ की यह पंक्तियाँ गुनगुनाता हुआ फुल बॉडी सर्च की मशीन से गुज़र जाता कि <br />
सुना है उस के बदन की तराश ऐसी है<br />
मकीं उधर के भी जलवे इधर के देखते हैं</p>

<p>लेकिन 48 साल की उम्र में यह जोखिम नहीं उठाया जा सकता. बल्कि मैं तो यह सोच कर कांप जाता हूँ कि किसी दिन अगर कोई चरमपंथी अंडरवियर के बजाए कहीं और बारूद छिपा कर विमान पर चढ़ गया तो फिर अमरीकी अधिकारी लाखों यात्रियों के साथ क्या क्या नहीं करेंगे? </p>

<p>मेरा यह डर सुन कर सर्जिकल दस्ताने बनाने वाले एक दोस्त ने कहा, तेरे मुँह में घी शक्कर...<br />
</p>]]></description>
         <dc:creator>वुसतुल्लाह ख़ान 
वुसतुल्लाह ख़ान
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	<link>https://bbcbreakingnews.pages.dev/blogs/hindi/2010/01/post-69.html</link>
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	<category></category>
	<pubDate>Wed, 20 Jan 2010 12:05:34 +0530</pubDate>
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<item>
	<title>अबे तेरी तो!</title>
	<description><![CDATA[<p>वैसे तो मुझे भारत और पाकिस्तान के संबंधों में कई बातें समझ में नहीं आती, लेकिन यह बात बिल्कुल समझ में नहीं आती कि अचानक बैठे बिठाए बात प्यार, मुहब्बत और शांति से शुरु होते होते गाली-गलौज में कैसे बदल जाती है.</p>

<p><strong>भारत</strong>- हम पाकिस्तान में लोकतंत्र की स्थिरता चाहते हैं. एक मज़बूत पाकिस्तान भारत सहित पूरे दक्षिण एशिया के हित में है.<br />
<strong>पाकिस्तान</strong>- हम भारत के साथ समग्र बातचीत का स्वागत करते हैं. दोनों देशों का नेतृत्व धीरे-धीरे सभी समस्याएं शांति प्रक्रिया के ज़रिए हल करने की क्षमता रखता है. </p>

<p><strong>भारत</strong>- हम चाहते हैं कि दोनों देशों के बीच व्यापार बढ़े और वीज़ा नियमों में नरमी हो.<br />
<strong>पाकिस्तान</strong>- यदि नियंत्रण रेखा की दोनों ओर से व्यापार और लोगों की अवाजाही में आसानी हो तो धीरे-धीरे सीमाएँ बे-मानी होती जली चाएँगी.</p>

<p><strong>भारत</strong>- दोनों देशों के बीच शांति प्रक्रिया अब पीछे नहीं जा सकती, लेकिन पाकिस्तान को सबसे पहले अपने यहाँ आतंकवाद के ख़िलाफ ठोस क़दम उठाने होंगे.<br />
<strong>पाकिस्तान</strong>- दक्षिण एशिया को भारत और पाकिस्तान शांति का केंद्र बना सकते हैं, लेकिन भारत को बलोचिस्तान में हस्तक्षेप बंद करना होगा.</p>

<p><strong>भारत</strong>- जब तक पाकिस्तान आतंकवाद का अड्डा बना रहेगा, बातचीत का कोई फ़ायदा नहीं.<br />
<strong>पाकिस्तान</strong>- भारत को आरोप-प्रत्यारोप से पहले अपने गिरेबान में झांकना चाहिए और इलाक़े में दादा बनने का शौक़ अपने मन से निकाल देना चाहिए.</p>

<p><strong>भारत</strong>- अगर चीन और पाकिस्तान से एक ही समय पर युद्ध होता है तो भारत दोनों का एक साथ मुक़ाबला करने की क्षमता रखता है.<br />
<strong>पाकिस्तान</strong>- जनरल दीपक कपूर को अच्छी तरह पता है कि पाकिस्तान क्या कर सकता है और भारतीय सेना कितने पानी में है.</p>

<p><strong>भारत</strong>- अब तक सीमा पार से आतंकवाद हो रहा है. अमेरिका और अन्य शक्तियाँ पाकिस्तान को समझाएँ कि वह आग से न खेले.<br />
<strong>पाकिस्तान</strong>- जिस प्रकार से हम ने पाकिस्तान हासिल किया है उसी प्रकार से कशमीर भी हासिल करेंगे. चाहे हज़ार साल तक युद्ध क्यों न करना पड़े. </p>

<p><strong>भारत</strong>- क्या पाकिस्तान भूल गया कि सन् 71 में क्या हुआ था. क्या उसे दोबारा याद दिलाना पड़ेगा.<br />
<strong>पाकिस्तान</strong>- हमारी ओर जो भी मैली आँख से देखेगा वह आँख निकाल दी जाएगी.</p>

<p><strong>भारत</strong>- पाकिस्तान अपने क़द से बड़ी बात करने से पहले अपने घर की आग तो बुझाले.<br />
<strong>पाकिस्तान</strong>- अबे तेरी तो....<br />
<strong>भारत</strong>- अबे तेरी ऐसी की तैसी.....</p>

<p>(यदि भारत और पाकिस्तान किसी अच्छे मनोचिकित्सक से संपर्क करने पर तैयार हो जाएँ तो इलाज के पैसे मैं अपनी जेब से देने को तैयार हूँ.)</p>]]></description>
         <dc:creator>वुसतुल्लाह ख़ान 
वुसतुल्लाह ख़ान
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	<link>https://bbcbreakingnews.pages.dev/blogs/hindi/2010/01/post-66.html</link>
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	<category></category>
	<pubDate>Fri, 08 Jan 2010 12:45:28 +0530</pubDate>
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<item>
	<title>सच्चाई का बँटवारा</title>
	<description><![CDATA[<p>मुझे एक रिटायर्ड जनरल ने एक वाक़या सुनाया कि अगस्त 1947 में देहरादून एकेडमी में अचानक यह आदेश आया कि कैडेट फैसला कर लें कि वे भारतीय सेना में रहेंगे या पाकिस्तानी फ़ौज का हिस्सा बनेंगे. </p>

<p>मुसलमान कैडेट्स को बताया गया कि उनके लिए पाकिस्तान जाना ज़्यादा उचित रहेगा. उसके बाद उनकी रवानगी के लिए व्यवस्था शुरू होगी. </p>

<p>फिर आदेश आया कि देहरादून की परिसंपत्ति का भी बँटवारा होगा जिसमें पुस्तकालय भी शामिल है. </p>

<p>जब पुस्तकों का बँटवारा होने लगा तो दिक्कत यह आ गई कि इन्साइक्लोपीडिया ब्रिटानिका के 20 संस्करणों का क्या किया जाए. </p>

<p>एक कैडेट ने कहा-लो यह क्या मुश्किल है. आधे संस्करण पाकिस्तान के और आधे भारत के. </p>

<p>एक दूसरे से जुदा होने का सोच कर सब उदास थे लेकिन इस कैडेट का प्रस्ताव सुन कर सब हँस पड़े. </p>

<p>आख़िर फ़ैसला हुआ कि इन्साइक्लोपीडिया ब्रिटानिका भारत में ही रहेगा. </p>

<p>यह प्रस्ताव देना वाला कैडेट बाद में भारत और पाकिस्तान में से किसी एक की सेना का सेनाध्यक्ष बना (मैं नाम नहीं बताऊँगा).</p>

<p>विभाजन की तरह दोनों देशों ने सच और झूठ को भी आधा-आधा बाँट लिया. </p>

<p>अधिकतर भारतीय इतिहासकार और पत्रकार आप को बताएँगे कि बँटवारे के समय लगभग डेढ़ से पौने दो करोड़ हिंदू और सिख पाकिस्तान में शामिल होने वाले इलाक़ों से निकल गए या हताहत हुए. </p>

<p>लेकिन वही इतिहासकार या पत्रकार ठीक तौर से नहीं बता पाएँगे कि कितने मुसलमान भारत से पाकिस्तान आए और कितने क़त्ल हुए.</p>

<p>इसी तरह पाकिस्तान में अगर किसी इतिहासकार या पत्रकार से यही सवाल पूछा जाए तो वह झट से कहेगा कि एक करोड़ मुसलमान घरों से उजड़े और 20 लाख क़त्ल हुए.</p>

<p>लेकिन हिंदू और सिख कितने उजड़े और क़त्ल हुए उस का ठीक से अंदाज़ा नहीं है.</p>

<p>आप पाकिस्तान में किसी से पूछें कि 1971 में सेना ने कितने बंगाली क़त्ल किए तो वह कहेगा कि शायद चंद हज़ार मरे होंगे. </p>

<p>और फिर अगली सांस में कहेगा कि मुक्ति वाहनी ने ग़ैर बंगाली पाकिस्तानियों की पूरी-पूरी आबादियाँ ख़त्म कर दीं.</p>

<p>आप ढाका में किसी से पूछें कि तुम लोगों ने कितने ग़ैर बंगाली मारे तो वह कहेगा कि चंद सौ मरे होंगे. लेकिन 10 लाख बंगाली क़त्ल हुए और 20 लाख बंगाली महिलाओं का बलात्कार हुआ.</p>

<p>अगर आज हिंदुस्तान के बँटवारे के 62 साल बाद और पाकिस्तान के बँटवारे के 38 साल बाद भी तीनों देशों के इतिहासकारों, बुद्धिजीवियों और पत्रकारों का यह रवैया है, तो यक़ीन कर लें कि मेरे और आप के जीवन में तो वह साउथ एशियन ट्रूथ ऐंड रिकंसीलिएशन कमीशन (South Asian Truth and Reconciliation Commission) बनने से रहा जो आधे सच को बाक़ी आधे सच से मिलाकर झूठ को एक गहरी क़ब्र में दफ़ना सके.</p>]]></description>
         <dc:creator>वुसतुल्लाह ख़ान 
वुसतुल्लाह ख़ान
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	<link>https://bbcbreakingnews.pages.dev/blogs/hindi/2009/12/post-62.html</link>
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	<category></category>
	<pubDate>Mon, 28 Dec 2009 16:33:50 +0530</pubDate>
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<item>
	<title>राम नाम अल्लाह है</title>
	<description><![CDATA[<p>इस बात का कोई महत्व नहीं है कि बाबरी मस्जिद ढहाए जाने की घटना को 17 साल पूरे हो गए. अगले साल 18वीं वर्षगाँठ होगी और उससे अगले साल 19वीं. </p>

<p>महत्व किसी बात का हो सकता है तो वह यह है कि क्या हम यह मानने को तैयार हैं कि इस घटना ने हिंदू-मुस्लिम संबंधों पर 1947 के विभाजन के बाद सबसे गहरा मनोवैज्ञानिक घाव लगाया है. </p>

<p>इस घटना के बाद हिंदुओं और मुसलमानों में एक-दूसरे के लिए कट्टरता की भावना बढ़ी है और इस भावना को कम कैसे किया जाए जो देश की धर्मनिरपेक्ष छवि को दर्शाए. </p>

<p>छह दिसंबर 1992 का दिन असल में इतिहास की वह माता है जिसके तुंरत बाद मुबंई के दंगे और फिर 1993 में मुंबई धमाके, गुजरात नरसंहार, मालेगाँव बम विस्फोट, समझौता एक्सप्रेस को आग लगाने जैसी घटनाएँ, सिमी, राम सेना और आज़मगढ़ जैसे नेटवर्क, मोदी स्टाइल राजनीति और कर्नल पुरोहित, वरुण गाँधी और मोहन भागवत जैसे ज़हन को जन्म दिया. </p>

<p>अगर बाबरी मस्जिद की 17वीं वर्षगाँठ याद रहेगी तो केवल इस आधार पर कि लिबरहान अयोग रिपोर्ट ने इस घटना में उन लोगों के शामिल होने की पुष्टि कर दी जिन्होंने बाबरी मस्जिद ढहाए जाने के अगले रोज़ अपने चहरों पर अफ़सोस का भभूत मल कर अख़बारों में तस्वीरें छपवाई थीं. </p>

<p>अगर वाक़ई लिबरहान अयोग की रिपोर्ट से यह परिणाम निलकता है कि यह कोई तुरंत जोशीला अमल नहीं था बल्कि एक योजना के तहत सब कुछ हुआ.</p>

<p>तो फिर इस रिपोर्ट की रोशनी में राष्ट्र और उसकी अदालतों का सिवाए इसके क्या कर्तव्य है कि वह न केवल इस अपराध में शामिल लोगों को कठघरे में लाए बल्कि यह घोषणा भी करें कि इस स्थान पर न केवल टूटी हुई मस्जिद का फिर से निर्माण होगा बल्कि हिंदू और मुसलमान मिल कर मस्जिद के बगल में एक शानदार मंदिर भी बनाएँगे. </p>

<p>ताकि वह राम जिसे मुस्लिम अल्लाह कहते हैं और वह अल्लाह जिसे हिंदू राम के नाम से जानते हैं, साथ-साथ रह सकें. </p>

<p>इस से कम पर तो कलंक का टीका मिटने से रहा.</p>]]></description>
         <dc:creator>वुसतुल्लाह ख़ान 
वुसतुल्लाह ख़ान
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	<link>https://bbcbreakingnews.pages.dev/blogs/hindi/2009/12/post-58.html</link>
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	<category></category>
	<pubDate>Sun, 06 Dec 2009 16:47:40 +0530</pubDate>
</item>

<item>
	<title>मैं बर्लिन वासी हूँ</title>
	<description><![CDATA[<p>9 नवंबर को 140 किलोमीटर लंबी 12 फुट ऊँची बर्लिन की दीवार ढहने की 20वीं वर्षगाँठ पर सब ख़ुश हैं. </p>

<p>बहुत से टीवी चैनल को जॉन एफ़ केनेडी की 26 जून, 1963 का वह लोकप्रिय भाषण बार बार याद आ रहा है जब उन्होंने बर्लिन की दीवार के साए में बने हुए मंच पर वामपंथी तानाशाही को ललकारते हुए कहा था कि आज मैं बड़े गर्व से कहता हूँ, "ईख़ बिन आईन बर्लिनर" (मैं बर्लिन वासी हूँ).</p>

<p>लेकिन आज किसी को याद नहीं कि पूर्वी जर्मनी की वामपंथी सरकार ने अगस्त 1961 में बर्लिन के विभाजन के लिए बाड़ लगाने का काम शुरु किया तो कुछ महीनों बाद वाशिंगटन की ओर से क्रेमलिन को संदेश भेजा गया कि अमरीका बर्लिन की दीवार को एक अंतरराष्ट्रीय यथार्थता के रूप में स्वीकार करता है और इस प्रक्रिया को ताक़त के ज़रिए चुनौती नहीं दी जाएगी.</p>

<p>केनेडी प्रशासन की ओर से दिलाए गए आश्वासन के 25 साल बाद 12 जून, 1987 को उसी बर्लिन की दीवार के साए में एक और अमरीकी राष्ट्रपति रोनॉल्ड रेगन ने कहा, "गोर्बाचौफ़ इस दीवार को गिरा दो." </p>

<p>लेकिन बर्लिन की दीवार ढहने से दो महीने पहले रेगन की प्रिय मित्र ब्रितानी प्रधानमंत्री मार्गरेट थेचर ने मिख़ाइल गोर्बाचौफ़ से मॉस्को में मुलाक़ात के दौरान कहा कि हम एक संयुक्त जर्मनी नहीं चाहते. इससे विश्व युद्ध के बाद की सीमाएँ परिवर्तित होनी शुरु हो जाएँगी. हम इसकी अनुमति नहीं दे सकते. इस प्रकार की प्रगति से न केवल अंतरराष्ट्रीय स्पर्धा को हानि पहुँचेगी बल्कि हमारी संप्रभुता भी ख़तरे में पड़ सकती है.</p>

<p>मार्गरेट थेचर और फ्रांसीसी राष्ट्रपति फ़ाँसवा मितराँ को यह साझा ऐतिहासिक डर लगा हुआ था कि संयुक्त जर्मनी यूरोप का सबसे बड़ा और शक्तिशाली देश बन जाने के बाद दूसरे विश्व युद्ध से पहले के जर्मनी के मुक़ाबले में महाद्वीप में ताक़त का संतुलन बिगाड़ने की ज़्यादा बेहतर स्थिति में होगा.</p>

<p>बर्लिन की दीवार के ढहने की 20वीं वर्षगाँठ के जश्न में अमरीकी विदेश मंत्री हेलरी क्लिंटन ने भी भाग लिया. </p>

<p>यह वही हिलेरी क्लिंटन हैं जिन्होंने 2005 में बतौर सेनेटर कहा था कि फ़लस्तीनी पश्चिमी तट और इसराइल के बीच उठाई जाने वाली 703 किलोमीटर लंबी, 30 फुट ऊँची दीवार और रुकावटें उठाने की शेरोन की परियोजना के पक्ष में हैं.</p>

<p>हालाँकि वे अच्छी तरह जानती थीं कि 2003 में संयुक्त राष्ट्र महासभा और 2004 में अंतरराष्ट्रीय अदालत एक ऐसी दीवार के निर्माण को अवैध क़रार दे चुकी थी जिसके नतीजे में प्रस्तावित फ़लस्तीनी राज्य का क्षेत्र न केवल साढ़े आठ प्रतिशत और घट जाएगा बल्कि लगभग पौने तीन लाख फ़लस्तीनी या तो इसराइल और पश्चिमी तट के आरपार विभाजित हो जाएँगे या दीवार के कारण पूरी तरह घिर जाएँगे. </p>

<p>सिद्ध क्या हुआ? सिद्ध यह हुआ कि बर्लिन की दीवार शीतयुद्ध की ज़रूरत भी थी और पश्चिमी देशों के हाथ में वामपंथियों के ख़िलाफ़ दुष्प्रचार का ऐसा हथियार भी जिसे वह आख़िर तक खोना नहीं चाहते थे. </p>

<p>लेकिन इसराइल और फ़लस्तीन के बीच उठाई जाने वाली दीवार अगर बर्लिन की दीवार से कहीं बड़ी और ऊँची हैं, इसके बावजूद कोई यूरोपीय और अमरीकी नेता इस दीवार के साए में यह नारा लगाने पर तैयार नहीं कि "ईख़ बिन आईन फ़लस्तीनियन" (मैं फ़लस्तीन वासी हूँ).<br />
</p>]]></description>
         <dc:creator>वुसतुल्लाह ख़ान 
वुसतुल्लाह ख़ान
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	<link>https://bbcbreakingnews.pages.dev/blogs/hindi/2009/11/post-49.html</link>
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	<category></category>
	<pubDate>Tue, 10 Nov 2009 12:31:47 +0530</pubDate>
</item>

<item>
	<title>मैं तो पेड़ पर रहूँगा</title>
	<description><![CDATA[<p>भारत और पाकिस्तान में अधिकतर सड़कों और व्यस्त चौकों पर आप को कोई साहब एक आध पिंजरा पकड़े हुए दिखाई पड़ेंगे. उन में फाख़ताएँ और प्यारी प्यारी सी विभिन्न रंगों की चिड़ियाँ बंद होती हैं. जैसे की ट्रेफिक सिग्नल की लाल बती रोशन होती है. यह साहब अपना पिंजरा उठाए बड़ी बड़ी गाड़ियों के बीच घूमना शुरु कर देते हैं और अंदर बैठे लोगों से कहते हैं कि अगर आप इतने पैसे दें तो वह पिंजरा खोल कर इन पक्षियों को आज़ाद कर देंगे. पक्षी आज़ाद हो कर आप को दुआएँ देंगे. भगवान/अल्लाह आप की किस्मत को अच्छा कर देगा और आप के मसले हल होते चले जाएँगे.</p>

<p>अगर आप शिकारी की बातों पर विश्वास कर पैसे देंगे तो वह आप के सामने पिंजरे का दरवाज़ा खोलेगा और सारे पक्षी फुर फुर करते हुए उड़ जाएँगे. आप भी ख़ुश, शिकारी भी ख़ुश और पक्षी भी ख़ुश. लेकिन जैसे ही आप की गाड़ी आगे बढ़ेगी. शिकारी इधर उधर मौजूद अपने माहिर शागिर्दों की मदद से उनमें से अधिकतर पक्षी पकड़ पर दोबारा उसी पिंजरे में बंद कर लेगा और फिर आप जैसे किसी नरमदिल आदमी से कहेगा कि इतने पैसे दो तो यह पक्षी आज़ाद कर दूँगा.</p>

<p>मुझे पाकिस्तान और भारत की सरकारें भी इस प्रोफेशनल शिकारी की तरह लगती हैं. यह सरकारें एक दूसरे के सैंकड़ों मछुवारों और वीज़ा अवधि से ज़्यादा रहने पर एक दूसरे के आम नागरिकों को पकड़ कर पिंजरों में बंद कर देती हैं और फिर एक दूसरे पर अपना ख़ुलूस साबित करने के लिए इन्हें कुछ कुछ समय बाद छोड़ती भी रहती हैं. बाद उन की जगह नए मछुआरे और नए नागरिक इतनी ही बड़ी संख्या में पकड़ लेती हैं.</p>

<p>चार साल पहले भी भारत के पास चार-पांच सौ पाकिस्तानी नागरिक और पाकिस्तान के पास भी लगभग इतने ही भारतीय नागरिक थे. आज भी दोनों देशों की जेलों में एक दूसरे के इतने ही नागरिक बंद हैं. हालाँकि पिछले चार सालों में दोनों देश एक दूसरे के दो हज़ार के लगभग नागरिक रिहा कर चुके हैं.</p>

<p>मैं सोच रहा हूँ कि सआदत हमन मंटो की कहानी "टोबा टेक सिंह" का वह पागल क्या बुरा था जो विभाजन के बाद सीमा पर पहुँच कर पार जाने के बजाए यह कहते हुए पेड़ पर चढ़ गया था कि न मैं भारत में रहूँगा और न पाकिस्तान में. मैं तो इस पेड़ पर ही रहूँगा.</p>]]></description>
         <dc:creator>वुसतुल्लाह ख़ान 
वुसतुल्लाह ख़ान
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	<category></category>
	<pubDate>Mon, 02 Nov 2009 15:48:40 +0530</pubDate>
</item>

<item>
	<title>ज़ात नहीं बदली जाती</title>
	<description><![CDATA[<p>जपान और चीन के बाद भारत एशिया की तीसरी बड़ी अर्थ व्यवस्था है. लेकिन राजस्व रिकॉर्ड देखा जाए तो भारत की एक अरब 28 करोड़ की आबादी में से केवल तीन करोड़ 15 लाख लोग टैक्स देते हैं और उन में से 80 हज़ार लोग ऐसे हैं जिन की घोषित वार्षिक आय साढ़े दस लाख रुपये (22,600 अमरीकी डॉलर) है. मगर स्विस बैंकों सहित दुनिया की साठ से अधिक टैक्स बचाव/ छिपाओ संस्थाओं के ख़ुफिया खातों में चीनियों के केवल 9600 करोड़ डॉलर जमा हैं. जबकि इन ख़ुफिया खातों में भारतीयों के 15 हज़ार करोड़ डॉलर के लगभग जमा हैं. </p>

<p>आसान हिंदी में इस का अर्थ यह है कि दुनिया में काले धन का हर 11वाँ डॉलर किसी न किसी भारतीय के ख़ुफिया खाते में जमा है. अगर इस रक़म को भारत के 45 करोड़ इंतिहाई ग़रीब लोगों को बांट दिया जाए तो हर एक को लाख लाख रुपए मिल सकते हैं.</p>

<p>अब से तीन साल पहले स्विस बैंकर्स एसोसिएशन ने प्रस्ताव दिया था कि अगर भारत सरकार अनुरोध करे तो वह स्विस बैंकों के खातों की जानकारी दे सकती है. लेकिन आज तीन साल बाद भी सरकार "करते हैं, देखते हैं, सोचते हैं, बताते हैं," कर रही है. </p>

<p>पी चिदंबरम हों या प्रणव मुखर्जी या एस एम कृष्णा. सब हैरान हैं कि नक्सली इतने आपे से बाहर क्यों हो रहे हैं. कोई इस पर हैरान नहीं है कि दुनिया में मौजूद साढ़े गयारह खरब डॉलर में से डेढ़ खरब डॉलर के मालिक कुछ हज़ार भारतीय कैसे हैं और इतना बड़ा ख़ुफिया धन भारत से बाहर रखने में कैसे कामयाब हैं.</p>

<p>अब आप सोचेंगे कि पाकिस्तान का क्या हाल है. तो भाई पाकिस्तान का हाल इस क़ाबिल नहीं कि बताया जा सके. बस यूँ समझ लें कि 18 करोड़ की जनसंख्या में केवल 22 लाख कंपनियाँ और नागरिक टैक्स देते हैं. पिछले साल सब से ज़्यादा टैक्स एक बैंकर फारूक़ बंगाली ने ग्यारह करोड़ रुपए की घोषित आय पर दिया. नवाज़ शरीफ हर साल करीब बीस हज़ार रुपए और आसिफ ज़रदारी लगभग पच्चीस हज़ार रुपए टैक्स देते हैं. बाक़ी आप ख़ुद समझदार हैं.</p>

<p>मैं यह सारा राग यह ख़बर सुन कर अलापने पर विवश हुआ हूँ कि जर्मनी के 44 सबसे अमीर लोगों ने सरकार से अनुरोध किया है कि देश चूँकि आर्थिक संकट से जूझ रहा है, इसलिए हम जैसे 22 लाख अमीरों पर कि जिन में से हर एक के पास पांच लाख यूरो से ज़्यादा जमा हैं, सरकार पांच प्रतिशत ज़्यादा टैक्स लगा कर एक सौ अरब यूरो जमा कर अमीर और ग़रीब का फर्क़ कम कर सकती है. </p>

<p>देखा आप ने! जर्मनी जैसे खाते पीते बेफि़क्रे देश कभी भी हम जैसे ग़रीब देशों पर व्यंग्य करने से बाज़ नहीं आते. </p>

<p>वह जो कहते हैं कि पैसा आने से ज़ात नहीं बदलती. कमीना कमीना ही रहता है. <br />
</p>]]></description>
         <dc:creator>वुसतुल्लाह ख़ान 
वुसतुल्लाह ख़ान
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	<category></category>
	<pubDate>Mon, 26 Oct 2009 15:59:01 +0530</pubDate>
</item>

<item>
	<title>पेशाब पिशूब करना मना है</title>
	<description><![CDATA[<p>सामान्य देशों में लोग सुबह दफ़्तर जाने से पहले नाश्ता करते हुए इसलिए टीवी ऑन करते हैं कि कोई सुंदर चहरा देखें. किसी हल्की फुल्की बात पर हंसें. किसी राग का मज़ा लें और दिन की शुरुआत ख़ुशगवार अंदाज़ में करें. </p>

<p>लेकिन पाकिस्तान में अब लोग सुबह, दोपहर या शाम टीवी ऑन करने के पहले कई बार सोचते हैं. कहीं कोई धमाका न हो गया हो, कहीं आतंकवादी किसी बिल्डिंग में न घुस गए हों, कहीं कोई बड़ा आदमी मारा न गया हो, कहीं कोई छोटा आदमी ग़ायब न गया हो....</p>

<p>आज भी जब दफतर से मेरी पत्नी का एसएमएस आया कि ज़रा टीवी ऑन तो कीजिए. मैं समझ गया कि फिर कोई बुरा या बड़ा हो गया है. लेकिन अब सब लोगों की आदत सी हो गई है कि धमाका, लाशें, सैन्य कार्रवाई कोई ख़बर नहीं है. अगर मज़ा है तो बौखलाए हुए टीवी ऐंकर्स, अनाड़ी रिपोर्टर्स और गृह मंत्री रहमान मलिक को देखने में है. यह वह मख़लूक़ है जो हर ट्रेजडी को ब्लैक कॉमेडी में बदल देती है.</p>

<p>ऐंकर... सूचना के अनुसार हमलावर "सशस्त्र बंदूक़ें" लेकर पुलिस प्रशिक्षण केंद्र में दाख़िल हो गए हैं. <br />
ऐंकर (रिपोर्टर से) आप ने अभी कहा कि इमारत के अंदर से गोलीबारी हो रही है. क्या आप बता सकते हैं कि इस समय कितने लोग फंसे हुए हैं और इन में घायल कितने हैं.</p>

<p>रिपोर्ट... अभी अभी एक आतंकवादी निकल कर भागा है. भागने के अंदाज़ से लगता है कि वह दक्षिण वज़ीरिस्तान से आया है.</p>

<p>ऐंकर... आइए दर्शको, हम आप को गंगाराम अस्पताल लेकर चलते हैं जहाँ हमारे रिपोर्टर मिस्टर फलाँ फलाँ मौजूद हैं. मिस्टर फलाँ फलाँ यह बताइए कि इस समय यहाँ पर लाए गए घायलों की क्या स्थिति है? क्या उन्हें ठीक तरह से चिकित्सा की सुविधाएँ मिल रही हैं. क्या दवाएँ पूरी हैं?</p>

<p>ऐंकर (रिपोर्टर से) अच्छा यह बताईए कि मोहम्मद रशीद नामी आतंकवादी जो गिरफ्तार हुआ है, उन के बारे में क्या जानकारी है.</p>

<p>रिपोर्टर... जी, मोहम्मद रशीद ने पुलिस को बताया है कि उन असली नाम मोहम्मद सिद्दीक़ है.</p>

<p>ऐंकर (पुलिस चीफ से) सुना है कि आंतकवादियों में कुछ महिलाएँ भी हैं. <br />
पुलिस चीफ... जी, अभी इस बारे में कुछ नहीं कहा जा सकता.</p>

<p>ऐंकर... तो इस की कोई संभावना है कि महिलाएँ भी हो सकती हैं??</p>

<p>फिर इंतेज़ार रहता है टीवी के सामने बैठने वालों को कि गृह मंत्री रहमान मलिक आज क्या कहेंगे.</p>

<p>रहमान मलिक... देखें जी, यह बहुत बड़ी सफलता है कि हमला करने वाले सभी आतंकवादियों को मार दिया गया है. यह आतंकवादी मानवता के दुशमन हैं. यह पैसे लेकर ऐसी कार्रवाईयाँ कर रहे हैं. यह विदेशी इशारों पर नाच रहे हैं. अगर आज यह अपने इरादों में कामयाब हो जाते तो बहुत बड़ी तबाही होती और मीडिया के अनुरोध करता हूँ कि वह जिम्मेदारी का प्रदर्शन करे और ऐसी घटनाओँ को ज़्यादा न उछाले.</p>

<p>रिपोर्ट (रहमान मलिक से) पिछले हफ्ते इस्लामाबाद में विश्व खाद्य कार्यक्रम के कार्यालय पर जो हमला हुआ था. उस के बारे में कुछ पता चला?<br />
रहमान मलिक... जी हाँ, उस की जांच हो रही है. अभी तक यही पता चला है कि एक आत्मघाती जो सुरक्षाकर्मियों को वरदी में था उस ने दफतर के बाहर मौजूद एक संतरी से कहा कि वह "पेशाब पिशूब" करना चाहता है. सुरक्षाकर्मी ने उसे अंदर का बाथरूम इस्तेमाल करने की इजाज़त दे दी और वह घुस गया . सुरक्षा संबंधी संस्थाओँ को आदेश दिया है कि आइंदा किसी अज्ञात को चाहे उस ने वरदी ही पहनी हुई हो पेशाब करने के लिए अंदर न छोड़ें.<br />
</p>]]></description>
         <dc:creator>वुसतुल्लाह ख़ान 
वुसतुल्लाह ख़ान
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	<link>https://bbcbreakingnews.pages.dev/blogs/hindi/2009/10/post-40.html</link>
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	<category></category>
	<pubDate>Thu, 15 Oct 2009 17:11:28 +0530</pubDate>
</item>

<item>
	<title>&apos;घबराए&apos; हुए चरमपंथियों ने क़हर ढाया</title>
	<description><![CDATA[<p>आत्मघाती चाहे मिलेशिया बैरेक, पेशावर के ख़ैबर बाज़ार या इस्लामाबाद में विश्व खाद्य कार्यक्रम के कार्यालय में फटे, बारूदी ट्रक चाहे मैरियट इस्लामाबाद या पर्ल कॉंटिनेंटल होटल में घुसे, कमांडो स्टाइल आतंकवादी एक्शन मनावाँ पुलिस केंद्र और श्रीलंकाई टीम के ख़िलाफ हो, सरकारी वक्तव्य एक ही होता है.</p>

<p>"आतंकवादी घबरा गए हैं और बदहवासी में यह आक्रमण अपनी कमज़ोरी छिपाने के लिए कर रहे हैं. आतंकवादियों को अच्छी तरह मालूम है कि अब उन के गिर्द सुरक्षाबलों का घेरा तंग हो चुका है. पूरा देश उन के ख़िलाफ उठ खड़ा है. इसलिए उन की यह कार्रवाईयाँ बुझे हुए चराग़ की आख़री भड़कती हुई लौ हैं. उन से घबराना नहीं चाहिए, ऐसे आक्रमण अभी और भी होंगे लेकिन आतंकवाद को पूरी तरह जड़ से उखाड़ दिया जाएगा."</p>

<p>यदि ऐसे सरकारी वक्तव्यों पर यक़ीन कर लिया जाए तो फिर जीएचक्यू रावलपिंडी पर होने वाला हमला समझने में कोई मुश्किल नहीं होनी चाहिए. यानी दर्जन भर आतंकवादियों ने एक महीने पहले इस्लामाबाद के करीब आवान टाउन में "घबरा" कर एक घर कराए पर लिया. </p>

<p>बीस पच्चीस दिन तक "बदहवासी" के आलम में घटनास्थल के नक़्शे बनाए और जीएचक्यू का सर्वेक्षण किया. "इंतेहाई कायर" हो कर सैन्य वरदियाँ पहनीं और "दहशतज़दा" हो कर एक मोटर साईकल और सुज़ूकी वैन में जीएचक्यू की दो सुरक्षा चौकियाँ पार कीं और कांपते हाथों से दो ग्रेनेड फेंक कर छह सैन्य अफसरों और जवानों को मार दिया. </p>

<p>इस दौरान आतंकवादियों के कुछ साथी भी मारे गए. यह दृश्य देख कर बाक़ी आतंकवादियों के "हाथ पावँ फूल गए" और उन्हों ने दो फौजी इमारतों में घुस कर चालीस के लगभग लोगों को उन्नीस घंटे केलिए बंधक बना लिया.</p>

<p>आतंकवादियों की इस "बदहवासाना दनदनाहट" पर सरकारी तसल्लियाँ सुन कर मुझे वह कहानी याद आ रही है कि एक हकीम साहब के पास डायरिया का मरीज़ आया. </p>

<p>हकीम साहब ने कहा यह गोलियाँ इस्तेमाल करो इंशाअल्लाह फ़ायदा होगा. हिकमत में चूँकि मर्ज़ को दबा कर नहीं बल्कि उभार कर ख़त्म किया जाता है इसलिए दवा के इस्तेमाल से अगर और दस्त आएँ तो घबराना नहीं. </p>

<p>दो दिन बाद मरीज़ का बेटा हकीम साहब के पास आ कर शिकायती लहजे में बोला कि अब्बा को तो दवा के इस्तेमाल के बाद इतने दस्त आए हैं कि चारपाई से लग गए हैं. हकीम साहब ने कहा, "घबराओ नहीं दवा अपना असर कर रही है और मर्ज़ बाहर निकाल रही है, अभी दस्त आएँगे फिर फ़ायदा दिखना शुरु हो जाएगा". </p>

<p>तीन दिन बाद मरीज़ का बेटा फिर हकीम साहब के पास आया यह बताने के लिए कि अब्बा इंतक़ाल फ़रमा गए हैं. हकीम साहब ने एक आह भरते हुए कहा, "मरना तो एक दिन हर एक है. शुक्र है दस्त बंद हो गए".</p>]]></description>
         <dc:creator>वुसतुल्लाह ख़ान 
वुसतुल्लाह ख़ान
</dc:creator>
	<link>https://bbcbreakingnews.pages.dev/blogs/hindi/2009/10/post-39.html</link>
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	<category></category>
	<pubDate>Tue, 13 Oct 2009 19:25:49 +0530</pubDate>
</item>

<item>
	<title>ठन ठनन ठानाँ ठणन</title>
	<description><![CDATA[<p>जितना ऊधम दिल्ली की लोकसभा में उस समय मचा था जब मन मनोहन सिंह ने अमरीका-भारत असैनिक परमाणु संधि संसद से पारित कराने के लिए अपनी राजनीतिक पगड़ी दाँव पर लगा दी थी, उस से दोगुना बवाल उस समय पाकिस्तान में कैरी-लूगर बिल के मामले पर खड़ा हुआ है. </p>

<p>भांत भांत के टीवी चैनल्स पर इतना शोर है कि हर बोलने वाला दूसरे से पूछ रहा है कि मैं ने अभी अभी क्या कहा? इस ऊधम बाज़ी में हैलरी क्लिंटन की यह बात भी दब कर रह गई है कि बिल पर बात करने से पहले उसे पढ़ तो लो.</p>

<p>कैरी-लूगर बिल की निंदा करने वालों का सारा बल उस पर है कि अमेरिका को यह जुर्रत कैसे हुई कि वह सहायता की क़िस्त देने से पहले अमरीकी विदेश मंत्री से यह सर्टिफ़िकेट माँगे कि पाकिस्तानी सेना लोकतंत्र के ख़िलाफ कोई क़दम नहीं उठाएगी. सैनिक पदों पर अफसरों की तरक़्क़ी के फ़ैसलों में असैनिक सरकार भी भागेदार होगी.</p>

<p>पाकिस्तान आतंकवाद और आतंकवादी संगठनों के चोरी-छुप्पे फैलाव में शामिल लोगों के बारे में पूरी जानकारी देगा. और यह सर्टिफ़िकेट शिक्षा, स्वास्थ और सामाजिक विकास के लिए दिए जाने वाले पैसे पर नहीं बल्कि सैनिक सहायता के लिए चाहिए होगा.</p>

<p>लेकिन कैरी-लूगर बिल विरोधियों को इस बात से कोई दिलचस्पी नहीं है कि इस के एक एक शब्द को पढ़ें. सब अपने कान चेक करने के बजाए कुत्ते के पीछे भाग रहे हैं. </p>

<p>"ज़रदारी ने पाकिस्तान को सस्ते में बेच दिया है." "इस बिल के अनुसार मिलने वाली सहायता से पाकिस्तान की संप्रभुता ख़तम हो जाएगी." "यह सर्टिफ़िकेट वाली बात भारतीय लॉबी ने बिल में डलवाई है." "अमेरिका चाहता है कि पाकिस्तानी सेना की शक्ति ही ख़तम हो जाए." "यह पाकिस्तान को बदनाम करने का षडयंत्र है." "हम भूखे मरना पंसद करेंगे लेकिन शर्तों वाली भीख नहीं लेंगे." आदि, आदि, आदि.</p>

<p>लेकिन इस शोर शराबे का एक बड़ा कारण यह भी है कि मीडिया चाहे कहीं का भी हो यह वह वैम्पायर है जिसे हर रात अपने पेट की आग बुझाने के लिए ताज़ा मोटा शिकार चाहिए.</p>

<p>कोई चाल ऐसी चलो यारो अब,<br />
कि समन्दर भी पुल पर चले <br />
फिर वो चले उस पे या मैं चलूँ<br />
शहर हो अपने पैरों तले<br />
कहीं ख़बरें हैं, कहीं क़ब्रें हैं<br />
जो भी सोए हैं क़ब्रों में उनको जगाना नहीं <br />
ठन ठनन ठानाँ ठणन, ठन ठनन ठानाँ ठणन</p>]]></description>
         <dc:creator>वुसतुल्लाह ख़ान 
वुसतुल्लाह ख़ान
</dc:creator>
	<link>https://bbcbreakingnews.pages.dev/blogs/hindi/2009/10/post-36.html</link>
	<guid>https://bbcbreakingnews.pages.dev/blogs/hindi/2009/10/post-36.html</guid>
	<category></category>
	<pubDate>Thu, 08 Oct 2009 12:05:44 +0530</pubDate>
</item>

<item>
	<title>बासठ वर्षीय सारस और लोमड़ी</title>
	<description><![CDATA[<p>कराची से दिल्ली हफ़्ते में एक बार फ़्लाइट जाती है और बहुत ही भरी हुई फ़्लाइट होती है. लेकिन उस रूट पर चलने वाली पीआईए के बोइंग 737 में घुसते ही दोनों देशों के आपसी संबंधों का अंदाज़ा हो जाता है. </p>

<p>दोनों देश चूँकि हर कुछ समय के बाद एक दूसरे से किसी भी बात को लेकर हत्थे से उखड़ जाते हैं शायद इसलिए सीट पर बैठते ही एक हत्था हिला और मेरे हाथ में आ गया.</p>

<p>उस फ़्लाइट में किसी दुबली पतली नाज़ुक सी एयर होस्टेस या स्मार्ट स्टुवर्ड के बजाए मोटा ताज़ा और पहलवान दिखने को मिलता है. शायद इसलिए कि भारतीय यह नहीं समझ लें कि हम देखने में उन से कमज़ोर या उन्नीस हैं. </p>

<p>एक मुसाफ़िर ने जब 50 वर्षीय एयर होस्टेस से पानी माँगा तो उसने दिल को लुभा लेने वाली मुस्कुराहट के साथ बहुत जल्द काग़ज़ का गिलास, पेपर नैपकिन के साथ आगे कर दिया. मैंने पानी माँगा तो अभी लाती हूँ कह कर आगे बढ़ गई. </p>

<p>दस मिनट बाद फिर पानी माँगा तो उसने काग़ज़ का गिलास बिना पेपर नैपकिन मेरी तरफ़ ऐसी मुस्कान के साथ बढ़ाया जैसे दोनों देश एक दूसरे को देख यूं मुस्कुराते हैं जैसे कर्ज़ ब्याज के साथ लौटा रहे हों. </p>

<p>मैंने सोचना शुरू किया कि इस एयर होस्टेस ने एक मुसाफ़िर को क्यों मुस्कुरा कर पेपर नैपकिन के साथ पानी दिया और मुझे क्यों एक बनावटी मुस्कान के साथ गिलास थमाया. </p>

<p>यूरेका!!! वजह समझ में आ गई !!! उस मुसाफ़िर ने सफ़ेद शलवार कमीज़ पहनी हुई थी और मैंने बदक़िस्मती से जींस पर फ़ैब इंडिया का गेरूआ शर्ट कुर्ता पहना हुआ था!!!</p>

<p>ये फ़्लाइट जिसमें आधे से अधिक वो दक्षिण भारतीय कामगार और उत्तर भारतीय प्रवासी थे जो खाड़ी के अरब देशों से कराची के रास्ते दिल्ली जा रहे थे. उन्होंने शुद्ध उर्दू में ये एलान सुना. </p>

<p>ख़्वातीन-ओ-हज़रात अस्सलाम अलैकुम. हम आपके शुक्रगुज़ार हैं कि आपने अपनी परवाज़ के लिए पीआईए का इंतख़ाब किया.बराहेकरम अपनी निशस्त की पुश्त सीधा कर लीजिए. बालाइख़ाना बंद कर लीजिए. आपके मुलाहिज़े के लिए हिफ़ाज़ती तादाबीर का किताबचा आपके सामने की सीट की जेब में है. हंगामी हालात में इस्तेमाल के लिए हिफ़ाज़ती जैकेट ज़ेरे निशस्त है. उम्मीद है आपका सफ़र पुरकैफ़-ओ-ख़ुशगवार गुज़रेगा.</p>

<p>मैंने साथ बैठे सरदार जी से पूछा गुरू जी एलान पल्ले पड़ा? कहने लगे वाहे गुरु जाने. मेरे पल्ले ते कुछ नहीं पया.</p>

<p>मुझे कुछ साल पहले की एक और फ़्लाइट की घोषणा याद आ गई. कृपया करके ये घोषणा ध्यान से सुनिए. ;हम मुंबई से कराची की उडा़न पर आपका हार्दिक स्वागत करते हैं. हमारी यह उडा़न एक घंटा एवं पाँच मिनट की होगी. कृपया सुरक्षा बेल्ट बाँधे रखिए. इलेक्ट्रानिक उपकरण बंद रखिए क्योंकि उड़ान के दौरान विमान के संचार तंत्र में गड़बड़ी हो सकती है. आशा है कि इंडियन एयरलाइंस से आपकी यात्रा सुरक्षित, सुखद एवं मंगलमय रहेगी.'</p>

<p>मुझे याद है कि मैंने एयर होस्टेस से पूछा था कि अभी जो घोषणा हुई उसमें क्या कहा गया. कहने लगी सर आप बैठिए मैं अभी सर से पूछ कर बताती हूँ कि इसका आसान हिंदीकरण क्या है.</p>

<p>लेकिन इसमें इन बेचारों का क्या क़सूर! दोनों देश जब भी दिल्ली और इस्लामाबाद या न्यू यॉर्क या शर्म-अल-शेख़ या सार्क की साइडलाइंस पर वार्तालाप का मंडप सजाते हैं तो दोनों तरफ़ के नेताओं और नौकरशाहों की कोशिश होती है कि ऐसी ज़बान बोलें जिस से देखने वाले को यह शक हो कि कुछ बात हो रही है. पर इस बात का कोइ मतलब न निकलने पाए. </p>

<p>एक था सारस और एक थी लोमड़ी. दोनों में हर समय ख़ट-पट रहती थी. एक दिन शेर की कोशिशों से दोनों में तालमेल हो गया. लोमड़ी ने कहा सारस भाई हमारे गिले-शिकवे दूर हो गए. आप मेरे घर खाने पर आइए. सारस जब बन ठन कर लोमड़ी के यहाँ पहुँचा तो लोमड़ी ने मुस्कुराते हुए एक प्लेट में पतला शोरबा उसके सामने रखा दिया. सारस ने लंबी चोंच में शोरबा भरने की बहुत कोशिश की लेकिन कुछ कामयाबी न हुई. और लोमड़ी अरे आप तो बहुत तकल्लुफ़ कर रहे हैं कहती हुई लप-लप सारा शोरबा पी गई.</p>

<p>सारस ने लोमड़ी से कहा कि कल शाम आप मेरे यहाँ खाने पर आइए मुझे बहुत ख़ुशी होगी. लोमड़ी जब पहुंची तो सारस ने एक सुराही में बोटियाँ डालकर लोमड़ी के सामने रख दिया. लोमड़ी ने अपनी थूथनी सुराही में डालने की कई बार कोशिश की लेकिन वो एक भी बोटी न निकाल सकी. सारस ने कहा अरे आप तो मुझ से भी ज़्यादा तकल्लुफ़ कर रही हैं. सारस ने अपनी लंबी चोंच सुराही में डाली और सब बोटियाँ चट कर गया.</p>

<p>बासठ वर्ष बाद कॉंफ़िडेंस बिल्डिंग और कंपोज़िट डायलॉग के साए में सारस और लोमड़ी की कहानी जारी है.</p>]]></description>
         <dc:creator>वुसतुल्लाह ख़ान 
वुसतुल्लाह ख़ान
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	<link>https://bbcbreakingnews.pages.dev/blogs/hindi/2009/08/post-22.html</link>
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	<pubDate>Thu, 13 Aug 2009 14:41:09 +0530</pubDate>
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	<title>झंडा और डंडा</title>
	<description><![CDATA[<p>क्या आपने तिरंगा ग़ौर से देखा है, ज़रूर देखा होगा. लेकिन कभी आप ने ये सोचने की तकलीफ़ उठाई कि कपड़े के तीन विभिन्न पट्टियों को क्यों जोड़ा गया था और फिर बीच में अशोक चक्र क्यों बना दिया गया.</p>

<p>जब पिंगली वेंकैया साहेब ने ये तिरंगा डिज़ाइन किया तो उन्होंने नारंगी पट्टी यह सोचकर ड्राइंग बोर्ड पर बिछाई होगी कि भारत का हर व्यक्ति अपने ज़मीर का जवाबदेह होते हुए बहादुरी के साथ हर तरह की क़ुर्बानी के लिए तैयार होगा. </p>

<p>लेकिन वेंकैया साहेब को क्या मालूम था कि नारंगी रंग का ये मतलब लिया जाएगा कि अपने ज़मीर के ख़ंजर से बहादुरी के साथ दूसरे को क़ुर्बान कर डालो.</p>

<p>फिर वेंकैया साहिब ने नारंगी पट्टी के साथ सफ़ेद पट्टी जोड़ी. उनका ख़्याल था कि सफ़ेद रंग सच्चाई और पवित्रता की निशानी है. पर उन्हें क्या मालूम था कि इस सफ़ेद पट्टी की छाँव में इतना झूठ फैलाया जाएगा कि वो सच लगने लगेगा.</p>

<p>फिर उन्होंने उस सफ़ेद पट्टी में 24 डंडों वाला नीला अशोक चक्र ये समझकर लगाया होगा कि हर व्यक्ति 24 घंटे ईमानदारी के साथ अपना काम निपटाकर खुद को और देश को आगे बढ़ाएगा. पर उन्हें क्या पता था कि उनके बाद के लोग इस अशोक चक्र को घनचक्र के तौर पर चलाएंगे. </p>

<p>फिर वैंकया साहिब ने हरी पट्टी यह सोचकर जोड़ी होगी कि सब इस तिरंगे के साए में फले फूलेंगे. लेकिन उन्हें क्या पता था कि इस तिरंगे के साए में सिर्फ़ ताक़तवर फलेंगे और कमज़ोर सिर्फ़ फूलेंगे. </p>

<p>इसी तरह सीमा पार अमीरूद्दीन क़िदवई ने जब पाकिस्तान का परचम डिज़ाइन किया होगा तो वेंकैया साहेब की तरह क़िदवई साहिब के भी बड़े पवित्र ख़्यालात रहे होंगे. जैसे ये कि इस झंडे में अस्सी फ़ीसदी रंग हरा होना चाहिए जिससे ये मालूम हो कि इस मुल्क में बहुसंख्या मुसलमानों की है. मगर बेचारे क़िदवई साहिब को अंदाज़ा ही नहीं था कि इस हरे झंडे के तले मुसलमान से ज़्यादा सुन्नी, शिया, वहाबी, देवबंदी, बरेलवी और तालेबान फले फूलेंगे.</p>

<p>क़िदवई साहेब ने इस हरे रंग पर चाँद और तारा भी चढ़ा दिया. ताकि इस झंडे को उठाने वालों का सामूहिक विकास पूरी दुनिया चाँद सितारों की रौशनी की तरह देख सके. मगर क़िदवई साहेब को ख़बर नहीं थी कि जो क़ौम रमज़ान के चाँद पर एकमत न हो सकी वो विकास के चाँद को कैसे देख सकेगी.</p>

<p>क़िदवई साहेब ने हरे झंडे में एक पतली-सी सफ़ेद पट्टी का भी इज़ाफ़ा किया. जिससे शायद उनकी मुराद ये थी कि इस मुल्क में अल्पसंख्यक अमन-सकून के साथ रह सकेंगे. लेकिन क़िदवई साहिब ने जो झंडा डिज़ाइन किया उसमें एक कमी यह रह गई कि ये झंडा सफ़ेद पट्टी में डंडा दिए बग़ैर लहराया नहीं जा सकता. इस कमी का हर सरकार ने बहुत ख़ूब फ़ायदा उठाया.</p>

<p>कहने का मतलब ये है कि भारत और पाकिस्तान को अपने झंडे अब दोबारा डिज़ाइन करने चाहिए ताकि वो असल हक़ीकत और सच्चाई का प्रतिनिधित्व कर सकें.<br />
</p>]]></description>
         <dc:creator>वुसतुल्लाह ख़ान 
वुसतुल्लाह ख़ान
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	<link>https://bbcbreakingnews.pages.dev/blogs/hindi/2009/07/wusat-flag-blog.html</link>
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	<category></category>
	<pubDate>Sat, 04 Jul 2009 12:06:26 +0530</pubDate>
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